मामला तब और गंभीर हो गया जब शो के दूसरे जज जॉन टोरोडे ने ये कहते हुए ट्वीट किया कि रेनडांग शायद इंडोनेशियन डिश है। इस ट्वीट के जवाब में जकार्ता के एक सोशल मीडिया यूज़र ग्रिफ़िन शॉनरी ने लिखा- क्या रेनडांग के नाम पर मलेशिया और इंडोनेशिया को लड़ाने की कोशिश की जा रही है। हम ऐसा नहीं होने देंगे,बल्कि हम एकजुट हो जाएंगे।मलेशिया और इंडोनेशिया पड़ोसी देश हैं,लेकिन ऐसा कम ही देखा गया है कि किसी मुद्दे पर इन दोनों में सहमति बनती हो, दोनों देशों के बीच तल्खी और तनाव का लंबा इतिहास रहा है, लेकिन रेनडांग के मुद्दे पर दोनों देश एक हो गए हैं।मूल रूप से ये डिश इंडोनेशिया की ही है लेकिन मलेशिया भी इस पर अपना दावा पेश करता है। कहा जाता है कि ये डिश इंडोनेशिया में पश्चिमी सुमात्रा के आदिवासियों मिनांगकाबुआ लोगों की है,वो इसे चिकन से नहीं बल्कि भैंस के गोश्त से बनाते हैं।
भैंस मिनांगकाबुआ जनजाति की संस्कृति का अहम हिस्सा है। इसे तैयार होने में करीब सात घंटे लगते हैं, कहा तो ये भी जाता है कि 'रेनडांग' शब्द भी 'मेरेनडांग' शब्द से आया है, जिसका मतलब है धीमी आंच पर पकाना।सुमात्रा यूनिवर्सिटी में इतिहास के प्रोफ़ेसेर गुस्ती अनन बताते हैं कि मिनांगकाबुआ लोगों के एक जगह से दूसरी जगह जाने की वजह से ही ये डिश इंडोनेशिया के पड़ोसी देशों में पहुंची. रिसर्च साबित करती है कि मिनांगकाबुआ लोग शादी करने के इरादे से भी पलायन करते थे।पलायन, कारोबार के नए मौक़े और तजुर्बे की ग़र्ज़ से भी होता था।ये लोग सिंगापुर और मलेशिया पैदल या समंदर के रास्ते जाते थे।रेनडांग चूंकि लंबे समय तक रखा जा सकता था लिहाजा ये लोग अपने साथ केले के पत्तों में लपेट कर रेनडांग ही सफ़र में खाने के लिए साथ लेकर चलते थे।
प्रोफेसर अनन कहते हैं कि ये पकवान तैयार करने की परंपरा कहां शुरू हुई सही तौर पर बता पाना मुश्किल है। लेकिन, एक बात दावे से कही जा सकती है कि मिनांगकाबुआ लोगों की सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और सियासी जीवन पर भारत का गहरा असर है,प्राचीन काल से ही पूर्वी एशिया और दक्षिणी भारत में सांस्कृतिक लेन-देन होता आया है।पंद्रहवीं सदी तक इंडोनेशिया मसालों का गढ़ बन चुका था।मसालों का व्यापार करने यहां बड़े पैमाने पर भारत, चीन, अरब, और यूरोप के लोग आते थे। इन सभी देशों की संस्कृति और खान-पान का यहां असर पड़ा। दूसरी शताब्दी में भारतीय व्यापारी सोना और टिन की तलाश में इंडोनेशियन द्वीपों पर आते थे। इसीलिए माना जाता है कि इंडोनेशिया के पकवान भारतीय खान-पान से प्रभावित हैं।
प्रोफेसर अनन कहते हैं कि रेनडेंग पकाते हुए जब नारियल का दूध और मसाले गाढ़े होने लगते हैं तो उसे 'कालियो' कहते हैं लेकिन, मिलांगकाबुआ लोग इसे 'करी' कहते हैं, ये शब्द भारत के कढ़ी शब्द से आया है।मलेशिया में अध-पका रेनडांग खाने का चलन है. यहां इसे शाही खाना भी कहा जाता है।इसे आम से ख़ास बनाने के लिए मसालों में थोड़ा फेरबदल किया जाता है। जैसे इसमें ताड़ की चीनी, और कसे हुए नारियल का दूध और तेल मिलाया जाता है, जो कि आम लोगों की पहुंच से बाहर है। इसे अमीर ही खरीद कर खा सकते हैं। बहुत से जानकार इस डिश का संबंध मिनांगकाबुआ लोगों के सब्र, अक़लमंदी और मज़बूत इरादों वाले जीवन दर्शन से जोड़कर भी देखते हैं।
रेनडांग रोजमर्रा का खाना नहीं है इसे शादी, त्यौहार या किसी नेता के राज तिलक जैसे मौक़े पर ही बनाया जाता है। ये पकवान लोगों के दिल के बहुत करीब है। सिंगापुर में मलेशियन रेस्टोरेंट चलाने वाले दो भाई हजमी और आरिफ जीन कहते हैं, कि सिंगापुर में लोग इसे पारंपरिक तरीक़े से चावल के साथा खाना पसंद करते हैं।जीन बंधुओं ने रेनडांग बनाने का तरीका अपनी दादी से सीखा था, जो 1940 में सिंगापुर पहुंची थीं। यहां उन्होंने सड़क किनारे अपने इलाके के पारंपरिक खाने बनाकर बेचने शुरू किए थे। बाद में उन्होंने यहां अपना रेस्टोरेंट खोल लिया जिसका नाम उन्होंने 'सब्र मिनानती' रखा। जिसका मतलब है 'सब्र से इंतज़ार कीजिए।
दरअसल इनकी दुकान पर खाने वालों की भीड़ जमा हो जाती थी और सब को एक वक्त संभालना मुश्किल होता था, इसीलिए उन्होंने अपने रेस्टोरेंट का नाम 'सब्र मिनानती' रखा।रेनडांग को एशिया के अलग-अलग देशों में कई दूसरे पकवानों के साथ मिलाकर भी खाया जाता है।हालांकि, जो लोग पारंपरिक तरीके से इसे तैयार करते हैं उनके मुताबिक ऐसा करने वाले इस पकवाने को विशुद्ध करते हैं।इसमें कोई शक नहीं है कि ये पकवान 'नुसनतारा' इलाकों से ही दूसरे देशों तक फैला है। नुसनतारा मलय-इंडोनेशियन शब्दावली है, जो द्वीपसमूह वाले देशों जैसे मलेशिया, सिंगापुर और ब्रुनेई के लिए इस्तेमाल होता है। अलग-अलग इलाकों में लोग मसालों में थोड़ा फेरबदल करके इसे अपने-अपने तरीके से बनाते हैं।मिसाल के लिए सिंगापुर की जूलिया अदनान पिछले 46 साल से भैंस के गोश्त वाला रेनडांग तैयार कर रही हैं।इसके लिए वो खास तरह की देगची का इस्तेमाल करती है।इनके मुताबिक़ किसी और बर्तन में पकाने से इसका जायका बदल जाएगा।जूलिया के रेनडांग बनाने का तरीका बहुत सादा है,वो इसे बनाने के लिए अपने गांव के पारंपरिक मसालों का ही इस्तेमाल करती हैं।जबकि जीन बंधुओं का रेनडांग बनाने का तरीका थोड़ा अलग है।वो हल्दी के ताज़े पत्ते, सूखी और ताजा दोनों तरह की मिर्च का इस्तेमाल करते हैं। यूनिवर्सिटी पुत्रा मलेशिया के प्रोफेसर डॉ. शाहरीम अब करीम का कहना है कि मलेशिया के लोगों ने इस डिश को अपना साबित करने के लिए इसमें कई तरह के बदलाव कर लिए हैं।मलेशिया में इसे राष्ट्रीय पकवान माना जाता है।खुशी के हरेक मौक़े और सरकारी कार्यक्रमों में रेनडांग ही परोसा जाता है। चिकन रेनडांग लोग रोज़मर्रा में खाते हैं लेकिन बीफ रेनडांग खास मौकों पर ही बनता है।विरासत के तौर पर इसे बनाने का तरीका एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचा है।बहरहाल इस विवाद के बाद जिस तरह इंडोनेशिया, मलेशिया और सिंगापुर के लोग इकट्ठा हुए हैं, उससे साफ़ है कि कोई पकवान तमाम देशों को जोड़ने का काम भी कर सकता है।