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रोजमर्रा की कई छोटी-छोटी चीजों के इस्तेमाल से 'कैंसर' का खतरा!

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एक रिसर्च में पाया गया है कि रोजमर्रा में इस्तेमाल होने वाली कई चीजों से कैंसर हो सकता है। जानिए, क्या कहती है रिसर्च।
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रिसर्च में पाया गया कि पर्यावरण से जुड़े कई रसायन जिनमें जल, वायु और खानपान शामिल हैं, इंसान के शरीर में दैनिक जीवनचर्या के रूप में प्रवेश करते हैं।

ऐसे 85 रसायनों पर 28 देशों के 174 वैज्ञानिकों ने जांच की और पाया कि सभी रसायन अपने आप में सुरक्षित हैं। लेकिन इनमें 50 रसायन ऐसे हैं जो अपने आप में पूरी तरह सुरक्षित होने के बावजूद एक दूसरे के साथ मिलकर कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी को जन्म देते हैं।

इस नए अनुसंधान में पता चला है कि रसायनों का यह संयोजन (मिश्रण) प्रत्येक पांच में से एक कैंसर के लिए जिम्मेदार हो सकता है।

अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिकों की टीम के इस खुलासे के बाद खानपान और सांसों द्वारा शरीर में जाने वाले ऐसे रसायनों के मिश्रण के प्रभावों पर शोध के समर्थन में और अधिक संसाधनों की जरूरत पर जोर दिया जाने लगा है।
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लंदन स्थित ब्रूनल यूनिवर्सिटी में कैंसर बायोलॉजिस्ट हैमद यासई ने एक प्रेस नोट में इसकी हामी भरी। उन्होंने कहा कि पर्यावरण में फैले जो रसायन अपने आप में पूरी तरह सुरक्षित हैं उनमें से कुछ के आपस में मिलने भर से यदि वे इंसान के शरीर में जाकर कैंसर को जन्म देते हैं तो यह एक वैश्विक महामारी का हिस्सा है।

28 देशों के वैज्ञानिकों का यह शोध ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की विशेष श्रंखला के तहत विश्व प्रसिद्ध शोध पत्रिका ‘कार्सिनोजेनेसिस’ में मंगलवार को प्रकाशित हुआ है।
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2013 में बना टास्क फोर्स

अंतरराष्ट्रीय संगठन ‘गेट टू नो कैंसर’ ने वर्ष 2013 में दुनिया के बड़े वैज्ञानिकों का हाई प्रोफाइल टास्क फोर्स बनाया था। इस टास्क फोर्स को आनुवांशिक और लाइफ स्टाइल से जुड़े तत्वों के आधार पर कैंसर पनपने के प्राथमिक शोध की जिम्मेदारी सौंपी गई थी।

टीम में न्यूजीलैंड के डॉ. लिंडा गुलीवर, इंग्लैंड के प्रोफेसर फ्रांसिस मार्टिन, यूके के प्रोफेसर एंड्र्यू बाथ जैसे विश्व प्रसिद्ध वैज्ञानिक शामिल थे जिनका नेतृत्व अमेरिका के विलियम गुडसन तृतीय ने किया।

अमेरिका के वरिष्ठ वैज्ञानिक विलियम गुडसन का कहना है कि हम निश्चित रूप से पर्यावरण में फैले उन रसायनों के बीच रह रहे हैं जिनसे बचा नहीं जा सकता है। ऐसे में कैंसर से प्रत्यक्ष संबंध रखने वाले इन रसायनों की कम से कम खुराक के प्रभावों पर साक्ष्य जुटाने का काम अब शुरू हो चुका है।
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