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तनाव से बचने के लिए 'फॉरेस्ट बाथिंग'

Mon, 27 Jun 2016 04:46 PM IST
मार्क जॉनसन/ बीबीसी
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फारेस्ट बाथिंग - फोटो : BBC
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 आज की भाग-दौड़ भरी जिंदगी में तनाव हमारे रहन-सहन का अहम हिस्सा बन गया है। घर से लेकर दफ्तर तक और रास्ते के जाम में फंसे होने तक, हम तनाव के शिकार होते हैं। इससे निपटने के तमाम तरीके बताए जाते हैं।
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अमरीका और जापान जैसे विकसित देशों में तनाव से निपटने का एक नया तरीका इस्तेमाल किया जा रहा है। इस थेरेपी का नाम है 'फॉरेस्ट बाथिंग' या 'जंगल स्नान'। नाम भले नया हो, इसके सिवा इसमें कुछ भी नया नहीं। इसमें लोगों को जंगल में, पेड़-पौधों के बीच वक्त बिताने कहा जाता है। उन्हें बताया जाता है कि जंगल में आराम से टहलते हुए वक्त गुजारें।

पेड़-पौधों की खुशबू सूंघें, पत्तियों की सरसराहट को सुनें, पेड़ों से गुजरती हवा को महसूस करें। अब इसमें नया तो कुछ नहीं। बरसों पहले स्कॉटलैंड के लेखक रॉबर्ट लुई स्टीवेंसन ने कहा था, ''जंगल अपनी खूबसूरती की वजह से लोगों का दिल नहीं लुभाते। असल में वहाँ की हवा बेहतरीन होती है।
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पेड़ों से निकलती मादक खुशबू, दिमाग पर गहरा असर डालती है। इससे थका हुआ इंसान बेहतर महसूस करने लगता है। जंगल उसकी आत्मा को छूकर जिंदगी का नया राग छेड़ देते हैं।'' स्टीवेंसन के ये बताने से पहले भी लोग ये जानते थे कि क़ुदरत के करीब वक़्त गुजारने से अच्छा महसूस होता है।

मगर, जैसे-जैसे हमारी जिंदगी की रफ्तार बदली, हम जंगलों से दूर होते गए। आज दुनिया की आधी आबादी शहरों में रहती है। इनमें से ज्यादातर लोगों का हरियाली से साबका नहीं पड़ता। उनके लिए करीब के पार्क में जाना भी कई बार मुमकिन नहीं होता। 

अमरीका के नेचुरलिस्ट एमॉस क्लिफर्ड ने तो बाकायदा एसोसिएशन ऑफ नेचर ऐंड फॉरेस्ट थेरेपी ही बना डाली है

फारेस्ट बाथिंग - फोटो : BBC
 अमरीका के नेचुरलिस्ट एमॉस क्लिफर्ड ने तो बाकायदा एसोसिएशन ऑफ नेचर ऐंड फॉरेस्ट थेरेपी ही बना डाली है। उन्होंने ही जंगलों में आराम से टहलने, पेड़-पौधों के बीच वक्त बिताने को ''फॉरेस्ट बाथिंग'' थेरेपी का नाम दिया है।

जिसमें लोगों को जंगलों में वक्त गुजारने के लिए कहा जाता है। एमॉस क्लिफर्ड के फॉरेस्ट बाथिंग टुअर्स में छह से पंद्रह लोगों की टीम तीन घंटे में जंगल में सिर्फ आधा मील चलती है। इसका मकसद होता है, जिंदगी की रफ्तार से पीछा छुड़ाना, कुछ वक्त आराम से बिताना, खरामा-खरामा चलना, क़ुदरत से नजदीकी महसूस करना।

इसकी जरूरत हमें इसलिए है कि हम अपने शहरी रहन-सहन के चलते क़ुदरत से दूर होते जा रहे हैं। अमरीका में हुए एक ताजा सर्वे के मुताबिक, हर अमरीकी रोजाना औसतन दस घंटे टीवी, कंप्यूटर, टैबलेट या स्मार्टफोन की स्क्रीन पर नजर गड़ाए रहता है। चीन, फिलीपींस और इंडोनेशिया में तो ये आंकड़े और भी खराब हैं।

इंसान ने कभी तकनीक का विकास किया था, अपनी मदद के लिए। वक्त बचाने के लिए। मगर आज तकनीकी चीजें ही लोगों का ज्यादातर वक्त ले जाती हैं। हम आज तकनीक के मालिक नहीं, गुलाम हो गए हैं। ऐसे ही हालात से निपटने के लिए फॉरेस्ट बाथिंग थेरेपी शुरू की गई है।

इसमें लोग जंगलों में वक्त बिताते हैं। आम तौर पर इस दौरान फोन या दूसरी तकनीकी चीज़ों से दूर रहने को कहा जाता है। हालांकि इस पर कोई पाबंदी नहीं होती। जंगल में टहलने के दौरान लोगों से क़ुदरत से जुड़े कुछ सवाल पूछे जाते हैं। जैसे कि मिट्टी की महक कैसी है? किसी पेड़ की छाल कैसी दिखती है? क्या आप जंगल में पेड़ों के बीच से गुजरती हवा को सुन सकते हैं।

क़ुदरत के करीब वक्त गुजारने से हमारे शरीर पर बहुत अच्छा असर पड़ता है

फारेस्ट बाथिंग - फोटो : BBC
एमॉस क्लिफर्ड कहते हैं कि आज हम हर पल मसरूफ रहना चाहते हैं। कोई न कोई काम निपटाना चाहते हैं। ऐसे में जंगल में आराम से टहलकर हम अपने नर्वस सिस्टम को दुरुस्त करते हैं। उसकी मरम्मत करते हैं।

आज इस बात के तमाम सबूत मिल चुके हैं कि क़ुदरत के करीब वक्त गुजारने से हमारे शरीर पर बहुत अच्छा असर पड़ता है। अमरीका की स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी में 2015 में हुआ रिसर्च बताता है कि जंगल में टहलने से हमारे दिमाग के एक खास हिस्से को खून की सप्लाई धीमी हो जाती है।

ये दिमाग का वो हिस्सा होता है, जिसके चलते हम हमेशा किसी न किसी सोच में पजड़े होते हैं। दूसरे तजुर्बे बताते हैं कि पेड़-पौधों के बीच वक्त गुजारने से हमारे डिप्रेशन में जाने का डर कम होता है। हमारा चित्त काम में बेहतर तरीके से लगता है। एपल के पूर्व सीईओ स्टीव जॉब्स अक्सर बाहर टहलते हुए मीटिंग करते थे।

इन दिनों और भी बड़ी कंपनियों के अधिकारी, इस चीज की नकल कर रहे हैं। तनाव कम करने के लिए जंगल में टहलने का ये चलन सबसे पहले जापान में शुरू हुआ। वहां 93 फीसद आबादी शहरों में रहती है। रोजमर्रा के तनाव झेलती है।

इसीलिए 1982 में ही वहां के जंगल विभाग ने फॉरेस्ट बाथिंग का अभियान शुरू किया था। आज जापान की सरकार, जंगल में घूमने के फायदों पर रिसर्च के लिए लाखों डॉलर खर्च कर रही है। 
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जापान की सरकार ने वन विभाग की मदद से कई फॉरेस्ट बेस तैयार किए हैं

फारेस्ट बाथिंग - फोटो : BBC
 जापान की सरकार ने वन विभाग की मदद से कई फॉरेस्ट बेस तैयार किए हैं। ये जगहें कंपनियों को किराए पर दी जाती हैं। ताकि वो अपने कर्मचारियों का तनाव कम करने के लिए वहां बैठकें कर सके। कुछ वक्त गुजार सकें।

जापान की ही तरह दक्षिण कोरिया में भी लोगों का इलाज करने के लिए जंगलों में हीलिंग क्लिनिक खोले गए हैं। इसी तरह फिनलैंड में भी 2007 में जंगलों से लोगों की सेहत सुधारने का अभियान शुरू किया गया है।

इसके तहत स्कूलों और दफ़्तरों के पास पेड़ लगाने का अभियान भी चलाया जा रहा है। वहीं अमरीकी नेचुरलिस्ट एमॉस क्लिफर्ड आज फेसबुक और गूगल जैसी बड़ी कंपनियों के साथ जुड़ गए हैं। वो क़ुदरती इलाज की मुहिम चला रहे हैं। साथ ही कुछ स्कूलों में भी वो बच्चों को क़ुदरत से नजदीकी बढ़ाने के नुस्खे सिखा रहे हैं।

अमरीका में पार्क आरएक्स नाम से एक अभियान चलाया जा रहा है। इसके तहत लोगों को कुदरत के करीब वक्त गुजारने के तरीके बताए जा रहे हैं। इस अभियान के सलाहकरा रॉबर्ट जार कहते हैं कि शहरों में पार्कों का बहुत कम इस्तेमाल होता है।

लोग बीमार होने पर फौरन दवा खाकर खुद को तुरंत ठीक कर लेना चाहते हैं। फॉरेस्ट बाथिंग थेरेपी, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और ब्रिटेन में भी अलग-अलग नामों से चलाई जा रही है। सबका मकसद एक ही है, क़ुदरत से नजदीकी बढ़ाना और तनाव को दूर भगाना।

इस थेरेपी का दूसरे देशों में भी पांव पसारना तय है। आखिर हिंदुस्तान में भी तो लोग तनाव के शिकार हैं। उन्हें भी क़ुदरती इलाज की जरूरत है। तो इसके लिए करना कुछ नहीं है। बस, जंगल की तरफ, हरियाली के बीच टहलने निकल जाना है।
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