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क्या आपका बच्चा स्कूल में सुरक्षित है?

Sat, 23 Jun 2018 01:11 PM IST
नेहा सजवाण
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बच्चा स्कूल से रोते हुए घर आता है। आप उससे पूछती हैं कि क्या हुआ? क्यों रो रहे हो? लेकिन उसकी ओर से आपको कोई जवाब नहीं मिलता। आप परेशान हैं कि आपके बच्चे को क्या हुआ है? आपको समझ नहीं आ रहा कि किससे बात करें? शिक्षक को बताएं? लेकिन क्या स्कूल वाले इसे गंभीरता से लेंगे?  सवाल उठने शुरु होते हैं, तो परेशानी बढ़ती चली जाती है।
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आजकल बच्चों के साथ हो रही घटनाएं माता-पिता के लिए चिंता का सबसे बड़ा कारण हैं। घर में आप बच्चे के पास होती हैं, लेकिन स्कूल का क्या? स्कूल में बच्चों के खिलाफ बढ़ते अपराध की खबरें कहीं न कहीं आपको भी चिंतित करती होंगी कि कहीं आपके बच्चे के साथ तो कुछ गलत नहीं हो रहा है। बच्चे बहुत मासूम होते हैं। उनकी नजर में दुनिया का हर शख्स अच्छा ही होता है, खासकर वे लोग जो उन्हें ज्यादा प्यार करें। इस उम्र में सच्चा और अच्छा प्यार पहचानने की क्षमता उनमें नहीं होती है। इस कारण वे अक्सर शोषण का शिकार हो जाते हैं। 

स्कूल वह जगह है, जहां आप अपने बच्चों को पढ़ने-लिखने और एक बेहतर इंसान बनने के लिए भेजती हैं। स्कूल में उसका अच्छे से ध्यान रखा जाए और अच्छी शिक्षा मिले, इसके लिए आप अच्छे से अच्छे स्कूल का चुनाव करती हैं और उसकी भारी फीस भी भरती हैं। बच्चे को स्कूल भेजकर आप निश्चिंत रहती हैं कि आपका बच्चा स्कूल में पढ़ रहा है। लेकिन इन सबके बावजूद भी कई बार स्कूल में आपका बच्चा अन्य बच्चों या स्कूल के शिक्षकों के साथ काफी असहज महसूस कर सकता है। ऐसी स्थिति को हम अक्सर बच्चे की उम्र में आने वाले बदलाव का नाम दे देते हैं या यह समझ लेते हैं कि बच्चा स्कूल के माहौल में नए बच्चों के साथ खुद को ढाल नहीं पा रहा है। लेकिन हो सकता है कि स्कूल में होने वाली कुछ घटनाओं से आपका बच्चा काफी परेशान हो। 

कुछ समय पहले की ही बात है। गुरुग्राम के एक नामी स्कूल के वॉशरूम में सात साल के एक बच्चे की हत्या हो गई थी। रिपोर्ट में पाया गया कि हत्या से पहले उसके शारीरिक शोषण की कोशिश की गई थी। यह सिर्फ एक स्कूल का मामला नहीं है। बच्चों के साथ स्कूलों में होने वाले शोषण की खबरें आजकल आम हैं। ऐसी स्थिति में बच्चे अक्सर डर की वजह से अपनी परेशानियों के बारे में माता-पिता को नहीं बता पाते। आपको उनसे स्कूल में होने वाली गतिविधियों के बारे में बात करने और उनकी मनोदशा को समझने की जरूरत है।

बच्चे के व्यवहार पर नजर
जब बच्चा अकेला रहने लगे और अपने दोस्तों के साथ खेलना-कूदना बंद कर दे, तो हो सकता है कि बच्चे के साथ कुछ बुरा हुआ हो। ऐसे में उससे खुलकर इस बारे में बात करें। बच्चों के व्यवहार में बदलाव आना भी उनके साथ होने वाले किसी तरह के शोषण के संकेत हो सकते हैं। 

वहीं जब बच्चे की भूख मर जाए या वह पहले से ज्यादा खाने लगे, तो यह भी एक चिंता का संकेत है। इसके अलावा बच्चे का हमेशा डरा-डरा सा रहना या खुद पर से उसका आत्मविश्वास खत्म हो जाना भी चिंता का विषय है। बच्चे का मन जब पढ़ाई में मन न लगे और याद की हुई चीजें भूलने लगे। अगर आपके बच्चे में भी ये संकेत दिखाई दे, तो हो सकता है कि वह किसी परेशानी से गुजर रहा हो।

खुलकर करें बात 
बच्चों से सभी विषयों पर खुलकर बात करें। स्कूल में होने वाली गतिविधियों के बारे में उनसे पूछें। उनके दोस्त और शिक्षिकों के बारे में भी उनकी राय जानने की कोशिश करें। बच्चों को उसके शरीर के सभी अंगों के बारे में खुलकर बताएं। बच्चों को ‘गुड टच’ और ‘बैड टच’ के बारे में जानकारी दें। उन्हें बताएं कि शरीर के कुछ प्राइवेट पार्टस हैं, जिन्हें कोई और नहीं छू सकता।

 टीवी देखते समय किसी प्रकार के अंतरंग दृश्य या फिर यौन शोषण के दृश्य आने पर हम अक्सर टीवी बंद कर देते हैं या बच्चों को इधर-उधर भेज देते हैं। ऐसा करने की बजाए उन्हें वह दिखाएं और उनके पूछे गए सवालों का सही जवाब दें। इससे उन्हें ‘गुड टच’ और ‘बैड टच’ का सही ज्ञान होता है।

स्कूल  नियमित तौर पर जाएं
आपकी जिम्मेदारी बच्चों को स्कूल भेजने के बाद खत्म नहीं हो जाती, बल्कि उसके बाद और भी अधिक बढ़ जाती है। आपको अपने बच्चे के स्कूल में हर हफ्ते या महीने में दो बार जरूर जाना चाहिए। स्कूल में जाकर सिर्फ शिक्षकों से ही न मिलें, बल्कि अपने बच्चे के दोस्तों और उसके साथ पढ़ने वाले अन्य बच्चों से भी मिलें और आपके बच्चे के साथ उनके व्यवहार को भी समझें। साथ ही स्कूल के माहौल और वहां की गतिविधियों पर भी गौर करें। देखें कहीं आपका बच्चा किसी के सामने डरा-डरा सा तो नहीं रहता। अगर ऐसा है, तो अपने बच्चे से खुलकर बात करें। 

बच्चों में जागरूकता
हम अक्सर अपने बच्चों को यह शिक्षा देते हैं कि बड़ों का आदर और सम्मान करें। स्कूल में अपने सीनियर्स से सीखें और शिक्षकों की हर बात मानें। इस वजह से बच्चे बुरी परिस्थिति में दूसरों को न कहने में कतराते हैं, विशेष रूप से अपने से बड़ों और शिक्षकों को न कहने में वह अच्छा महसूस नहीं करते। इसलिए उनको इन चीजों के बारे में जागरूक करने का काम आपका है। उन्हें बताएं कि हां या न कहने के लिए स्थिति बहुत मायने रखती है। बच्चों को बताएं कि असहज परिस्थितियों में बड़ों या बूढ़ों को न कहना सही है। साथ ही ऐसी परिस्थितियों के लिए आप उन्हें कोई शब्द भी दे सकती हैं, जिससे वे उस परिस्थिति के आने पर आपको संकेत दे सकें। 

जल्द उठाएं ठोस कदम
अगर आपको संदेह है कि आपके बच्चे के साथ इस प्रकार की कोई घटना हुई है, तो जिस पर भी आपको संदेह है, उससे अपने बच्चे को तुरंत अलग कर दें। अपने बच्चे को फिर उसके संपर्क में कभी न आने दें। आपको जिस पर भी संदेह है, उससे कोई बात किए बिना सीधे पुलिस को इसकी सूचना दें और आगे की कार्रवाई में सहयोग दें। आप चाइल्ड वेलफेयर समिति को भी इस बात की जानकारी दे सकती हैं। बच्चे से इसके बारे में बातों-बातों में पूछें। अगर बच्चा डर जाएगा, तो सहयोग नहीं करेगा। हो सकता है कि फिर वो आपको इससे संबंधित कुछ भी न बताए। इसलिए जरूरी है कि ऐसी स्थिति में धैर्य से काम लें।

सभी मां-बाप घर में अपने बच्चे को हर तरह की सुविधा देते हैं और उनकी सुरक्षा का पूरी तरह ख्याल रखते हैं। लेकिन अगर घर से बाहर या स्कूल में कोई बच्चे से दुर्व्यवहार करे, तो पेरेंट्स भी कुछ नहीं कर पाते। अक्सर जब बच्चों के साथ स्कूल में या ट्यूशन में यौन शोषण होता है, तो वे अपने माता-पिता को इस बारे में कुछ नहीं बता पाते। इससे बच्चे डिप्रेशन में चले जाते हैं। ऐसे में अपने बच्चों में दिखाई देने वाले कुछ संकेतों को जानकर उनके साथ होने वाले दुर्व्यवहार के बारे में पता लगा सकते हैं।

स्कूलों में दुर्व्यवहार और शोषण झेल रहे पीड़ित बच्चों की कोई विशेष उम्र नहीं होती। यह किसी भी उम्र के बच्चों के साथ घटित हो सकता है, जिसके कारण उन्हें शारीरिक ही नहीं, बल्कि मानसिक और भावनात्मक पीड़ा भी झेलनी पड़ती है। कई बार तो नौबत बच्चे की हत्या या आत्महत्या तक पहुंच जाती है। यौन शोषण के शिकार लड़कियां ही नहीं, बल्कि लड़के भी हो रहे हैं। ग्रामीण स्कूलों में तो शौचालय की सुविधा तक नहीं होती, जिसके चलते छात्राओं को विशेष तौर पर दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।  यौन शोषण के अलावा और भी कई बातें हैं, जिसमें आपका बच्चा खुद को असुरक्षित महसूस कर सकता है। कई बार कोई आपात स्थिति आ सकती है। उन पर भी आपको सजग रहना चाहिए।

-क्या स्कूल में अन्य बच्चे तुम्हें परेशान करते हैं?
-क्या तुम स्कूल में सुरक्षित महसूस करते हो?
-क्या स्कूल में किसी वजह से तुम असहज महसूस करते हो?
-क्या कोई सीनियर तुम्हारा मजाक उड़ाता है?
 
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सीबीएसई की गाइडलाइन
-स्कूल के अंदर आने-जाने वाले लोगों पर रखी जाए नजर।
-स्कूल परिसर में किसी भी तरह की गुप्त या छुपी हुई जगह न हो।
-स्कूल में काम करने वाले हर एक व्यक्ति (शिक्षक, प्रिंसिपल, चपरासी, अकाउंटेंट या अन्य) के बैकग्राउंड के बारे में पता करने के बाद ही उन्हें काम पर रखा जाए।
-स्कूल परिसर में एक डॉक्टर या नर्स की तैनाती अनिवार्य रूप से हो।
-स्कूल परिसर से 2 किमी की दूरी पर जो भी अस्पताल हो, उसके साथ टाई अप करना जरूरी है।
-स्कूल प्रशासन को चाइल्ड प्रोटेक्शन पॉलिसी को फॉलो करना जरूरी है। यानी कि बच्चे के साथ किसी भी तरह का टॉर्चर, मारपीट या शारीरिक शोषण नहीं किया जा सकता।

भले ही स्कूलों की ओर से नए दिशानिर्देशों का पालन किया गया हो। लेकिन बच्चे की सुरक्षा की जिम्मेदारी स्कूल और माता-पिता दोनों की है। इसलिए दोनों की ओर से ही सावधानी बरतना जरूरी है। माता-पिता को स्कूल के बारे में पूरी तरह से जानने की कोशिश करनी चाहिए। यदि बच्चे किसी भी समस्या के बारे में आपसे शिकायत करते हैं, तो उनकी बातों को ध्यान से सुनें। बच्चों के असामान्य व्यवहार को गंभीरता से लें और जल्द ही कोई ठोस कदम उठाएं। सोशल मीडिया का उपयोग करते समय भी उन पर नजर रखें। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप कितने व्यस्त हैं। आपको यह नहीं भूलना चाहिए कि आप माता-पिता पहले हैं, बाद में आपका प्रोफेशन। इसलिए अपने बच्चों के लिए आपको समय निकालना चाहिए। उनका दिन कैसा था या स्कूल से जुड़ी अन्य चीजों के बारे में उनसे जरूर पूछें।
- भावना बर्मी, मनोचिकित्सक
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