भारत में साल 2018 में टीबी के 21 लाख से ज्यादा मामले पंजीकृत हुए थे। वहीं, साल 2017 में टीबी के 18 लाख से ज्यादा मामले पंजीकृत हुए थे। अगर प्राइवेट नोटिफिकेशन यानी की निजी पंजीकरण की बात करें तो टीबी के 5.4 लाख मामले 2018 और 3.91 लाख मामले 2017 में सामने आए थे। लासेंट पैनल रिपोर्ट के मुताबिक, 2017 में भारत में टीबी की बीमारी से 4,21,000 मरीजों की मौत हुई थी। डॉक्टरों के मुताबिक बच्चों में कमजोर प्रतिरोधक प्रणाली की वजह से टीबी घातक हो सकता है। बता दें कि टीबी भारत में 2012 से ही नोटिफिकेबल डिजीज यानी की पंजीकृत बीमारी है। सरकार ने इसके लिए वेब-बेस्ड, केस बेस्ड पंजीकृत नेटवर्क स्थापित किया है। यह पहली बार था जब 2017 के मुकाबले 2018 में एक ही साल में 3 लाख मामले बढ़े थे। आइए विश्व टीबी दिवस के मौके पर इस संक्रामक रोग के बारे में जानते हैं..
विज्ञापन
2 of 4
टीबी
लासेंट की 2017 में आई रिपोर्ट कहती है कि माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरक्लोसिस जीवाणु की वजह से होने वाले टीबी से भारत में 4,21,000 लोगों की मौतें हुई थी। टीबी के खतरे को रोकने के लिए वायु प्रदूषण पर नियंत्रण करने की जरूरत है।
विज्ञापन
3 of 4
टीबी की बीमारी ज्यादातर फेफड़ों पर हमला करती है।
टीबी की बीमारी ज्यादातर फेफड़ों पर हमला करती है। हवा और संक्रमण की वजह से टीबी फैलता है। अगर टीबी यानी की क्षय रोग से ग्रसित मरीज खांसता या फिर छींकता है तो उसके साथ संक्रामक ड्रॉपलेट न्यूक्लिआई उत्पन्न होता है जो कि हवा के माध्यम से किसी अन्य व्यक्ति को संक्रमित कर सकता है। ये ड्रॉपलेट न्यूक्लिआई कई घंटों तक वातावरण में सक्रिय रहते हैं।
केंद्र सरकार ने साल 2025 तक देश में टीबी को खत्म करने का लक्ष्य रखा है। पिछले साल देश भर में टीबी के कुल 21 लाख 56 हजार तीन सौ 21 मरीज पंजीकृत किए गए थे। सबसे ज्यादा टीबी के मामले उत्तर प्रदेश में दर्ज किए गए थे। इसके बाद महाराष्ट्र और राजस्थान में सबसे ज्यादा टीबी के मरीज को पंजीकृत किया गया था। टीबी की वजह से भारत में हर चार में से एक बच्चे की मौत होती है। टीबी के 96 फीसदी मामले में रोग के बारे में पता ही नहीं चल पाता और उनका इलाज वक्त पर नहीं हो पाता है।