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वर्ल्ड आर्थराइटिस डे: दवा और इंजेक्शन के बिना भी पा सकते हैं गठिया में आराम, मिल गया तरीका

Mon, 12 Oct 2026 01:02 PM IST
अभिलाष श्रीवास्तव हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

World Arthritis Day 2026: क्या आप भी आर्थराइटिस की समस्या से परेशान हैं, घुटनों के दर्द और जकड़न के कारण चलना-फिरना भी मुश्किल हो गया है? स्वास्थ्य विशेषज्ञ बताते हैं, आर्थराइटिस में चलने का तरीका बदलना दर्द कम करने में मददगार हो सकता है। इससे एक साल में दर्द में राहत और कार्टिलेज के नुकसान में कमी के संकेत भी दिखे।
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अर्थराइटिस की समस्या और इसके खतरे - फोटो : Amarujala.com/AI
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विस्तार
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घुटनों में दर्द की दिक्कत लोगों के बीच बहुत कॉमन होती जा रही है, आमतौर पर आर्थराइटिस यानी गठिया को इसका सबसे बड़ा कारण माना जाता है। कुछ दशकों पहले तक गठिया को सिर्फ बुढ़ापे की बीमारी माना जाता था, हालांकि अब कम उम्र वाले भी इसका शिकार हो रहे हैं।

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घुटनों में दर्द की वजह से चलने-फिरने में परेशानी होती है और सीढ़ियां चढ़ना तक मुश्किल हो जाता है। दर्द से राहत पाने के लिए लोग तरह-तरह के उपाय करते रहते हैं, दवाओं या इंजेक्शन पर निर्भर रहते हैं। पर ज्यादातर मामलों में इससे सिर्फ लक्षण ही कम होते हैं, समस्या ठीक नहीं होती है।

इन जोखिमों के बीच एक नई रिसर्च लोगों के लिए उम्मीद की किरण बनकर आई है। वैज्ञानिकों ने पाया कि चलने के तरीके में छोटा-सा बदलाव करके भी घुटनों के दर्द को कम करने में मदद मिल सकती है। खास बात यह है कि इसके लिए हर व्यक्ति को एक ही तरीका अपनाने की जरूरत नहीं है। किसी के लिए पंजों को थोड़ा अंदर की ओर रखना फायदेमंद हो सकता है, तो किसी के लिए बाहर की ओर। क्लीनिकल ट्रायल में इस तकनीक के उत्साहजनक नतीजे सामने आए। एक साल बाद प्रतिभागियों ने दर्द में राहत महसूस की और घुटनों की कार्टिलेज को होने वाले क्षति में कमी के संकेत भी मिले। 

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आर्थराइटिस का खतरा - फोटो : Adobe Stock
गठिया से राहत पाने के लिए बदलिए चलने का तरीका

आज विश्व गठिया दिवस है। गठिया और अन्य रूमेटिक और मस्कुलोस्केलेटल बीमारियों के बारे में जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से हर साल 12 अक्तूबर को ये खास दिन मनाया जाता है। आइए इस मौके पर जान लेते हैं कि कैसे बिना दवाओं और इंजेक्शन के आसानी से कुछ बदलाव करके गठिया की दिक्कतों में लाभ पाया जा सकता है?
 
  • द लैंसेट रूमेटोलॉजी मेडिकल रिसर्च जर्नल में प्रकाशित एक क्लीनिकल ट्रायल से गठिया के मरीजों के लिए उम्मीद जगी है। विशेषज्ञों ने बताया कि चलते समय पैरों और पंजों का कोण यानी उनके मुड़ने की दिशा अपने हिसाब से बदलने से घुटनों के दर्द में काफी राहत मिल सकती है।
  • एक साल तक चले इस अध्ययन में जिन लोगों ने चलने का तरीका बदला, उन्हें दूसरे लोगों की तुलना में घुटनों की समस्या में काफी आराम मिला।
  • इतना ही नहीं, उनके घुटनों की कार्टिलेज के खराब होने की रफ्तार भी धीमी पड़ने लगी।

दर्द में मिलने वाली राहत का स्तर कुछ आम दवाओं से मिलने वाले फायदे की तरह ही देखा गया। विशेषज्ञों ने बताया कि यह घुटनों पर पड़ने वाले जरूरत से ज्यादा दबाव को भी कम करने में मदद कर सकता है। यही दबाव गठिया के बढ़ने और घुटने के अंदर मौजूद कार्टिलेज को नुकसान पहुंचने की एक वजह हो सकता है।

घुटनों में गठिया की समस्या - फोटो : Freepik.com
कार्टिलेज की बढ़ती समस्याओं का खतरा

मेडिकल रिपोर्ट्स से पता चलता है कि जोड़ों का घिसने वाला गठिया (ऑस्टियोआर्थराइटिस) 40 साल से अधिक उम्र के लगभग 22 प्रतिशत वयस्कों को प्रभावित करता है। इसके कारण रोजमर्रा के काम करने में परेशानी और व्यक्ति की कुल उत्पादकता पर भी असर हो सकता है।

इस बीमारी में जोड़ों के भीतर मौजूद कार्टिलेज धीरे-धीरे घिसने और खराब होने लगती है। कार्टिलेज एक चिकनी, लचीली परत होती है, जो हड्डियों के सिरों को ढककर उनके बीच गद्दी की तरह काम करती है। इसकी मदद से हड्डियां आपस में कम रगड़ खाती हैं और जोड़ आसानी से घूम-हिल पाते हैं। जब यह परत खराब होने लगती है, तो चलना, सीढ़ियां चढ़ना और कुर्सी से उठना-बैठना जैसी सामान्य गतिविधियां भी बहुत दर्द वाली हो सकती हैं।
 
  • इन समस्याओं का एक नया समाधान खोजने के लिए यूनिवर्सिटी ऑफ यूटा, न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी और स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने एक अलग तरीके पर काम किया। इसे गैट रीट्रेनिंग  कहा जाता है।
  • आसान शब्दों में कहें, तो इसका मतलब है चलने के तरीके को दोबारा सीखना और उसमें ऐसा बदलाव करना, जिससे घुटनों पर पड़ने वाला दबाव कम हो सके।
  • इस तरीके में चलने के दौरान शरीर का वजन घुटनों पर किस तरह पड़ता है, उसे भी बेहतर बनाने की कोशिश की जाती है।

अध्ययनकर्ताओं में से एक प्रो. स्कॉट उहलरिच कहते हैं,  हम पहले से जानते हैं कि ऑस्टियोआर्थराइटिस से प्रभावित घुटनों पर जितना ज्यादा दबाव पड़ता है, बीमारी के बढ़ने का खतरा उतना ही अधिक हो सकता है। यह भी पता था कि चलते समय पंजों की दिशा बदलने से घुटनों पर पड़ने वाले दबाव को कम किया जा सकता है। ऐसे में शारीरिक गतिविधियों और जोड़ों पर पड़ने वाले बल को बदलकर इलाज का नया तरीका ढूंढा जा सकता है।
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चलने का तरीका कम कर सकता है घुटने का दर्द - फोटो : adobe stock images
स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, पैरों के पंजों का कोण भी गठिया की समस्या में काफी मैटर करता है।

घुटने के जोड़ के अंदरूनी हिस्से को मेडियल कंपार्टमेंट और बाहरी हिस्से को लेटरल कंपार्टमेंट कहा जाता है। सामान्य तौर पर चलते समय घुटने के अंदरूनी हिस्से पर शरीर के वजन का ज्यादा दबाव पड़ता है। यही एक वजह है कि ऑस्टियोआर्थराइटिस अक्सर घुटने के अंदरूनी हिस्से को अधिक प्रभावित करता है। जिन लोगों को घुटने के इसी हिस्से में गठिया होता है, उनके लिए पहले से खराब हो चुके हिस्से पर बार-बार जरूरत से ज्यादा दबाव पड़ना नुकसान को और बढ़ा सकता है।

कैसे  मिल सकता है आराम?

चलते समय पंजों को किस दिशा में रखा जाता है, उसमें बदलाव करके इस दबाव को कुछ हद तक दूसरी तरफ बांटा जा सकता है। 
 
  • उदाहरण के लिए, पंजों को थोड़ा अंदर की ओर या बाहर की ओर मोड़कर चलने से घुटने पर लगने वाले बल की दिशा बदल सकती है। इससे प्रभावित कार्टिलेज पर पड़ने वाला दबाव कम होने की संभावना रहती है।
  • हालांकि पैरों का एक ही कोण हर व्यक्ति के लिए फायदेमंद नहीं होता।
  • कुछ लोगों को पंजों को थोड़ा अंदर की ओर करके चलने से फायदा हो सकता है, जबकि कुछ लोगों के लिए पंजों को सामान्य से थोड़ा बाहर की ओर रखना बेहतर हो सकता है। 

इस नए अध्ययन में शोधकर्ताओं ने हर व्यक्ति के लिए अलग-अलग चलने का तरीका चुना। इस व्यक्तिगत तरीके से यह बेहतर ढंग से तय किया जा सका कि किस व्यक्ति के घुटने पर दबाव किस तरह कम किया जा सकता है?

विशेषज्ञ कहते हैं, अपने डॉक्टर या फिजियोथेरेपिस्ट से मिलकर इस बारे में सलाह लें। सही मार्गदर्शन और अभ्यास से घुटने के दबाव को कम किया जा सकता है जिससे लक्षणों में आराम मिल सकता है।




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स्रोत:
Personalised gait retraining for medial compartment knee osteoarthritis: a randomised controlled trial


अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।
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