कोरोना के बाद आंखों की समस्या
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हल्के कोरोना संक्रमण के बाद भी आंखों की समस्याएं
स्वीडन में हुई एक नई रिसर्च ने डॉक्टरों को भी चौंका दिया है। इसमें ऐसे लोगों पर अध्ययन किया गया जिन्हें कोरोना संक्रमण हुआ था। इसमें वे लोग भी शामिल थे जिनमें संक्रमण बहुत हल्का था और बिना अस्पताल गए वे ठीक भी हो गए। अध्ययन के दौरान पाया गया कि इनमें से कई लोगों को महीनों और कुछ मामलों में तीन साल तक आंखों की परेशानियां खत्म नहीं हुईं।
- सबसे हैरान करने वाली बात यह रही कि सामान्य आई टेस्ट में उनकी आंखें बिल्कुल सामान्य दिखीं। यानी मरीज लगातार तकलीफ बता रहे थे, लेकिन जांच रिपोर्ट कह रही थी कि सब कुछ ठीक है।
- विशेषज्ञों ने बताया कि कोरोना संक्रमण का असर कुछ लोगों की आंखों पर महीनों नहीं और कई वर्षों तक भी रह सकता है। जिसको लेकर सभी लोगों को अलर्ट रहना चाहिए।
स्वीडन की लिंकोपिंग यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने ये अध्ययन किया है। शोधकर्ताओं ने ऐसे 100 लोगों की जांच की जिन्हें कोरोना होने के बाद आंखों से जुड़ी परेशानियां होने लगी थीं। इन सभी को कोरोना का हल्का संक्रमण हुआ था और किसी को अस्पताल में भर्ती नहीं होना पड़ा था।
हालांकि संक्रमण ठीक होने के बाद भी उनकी आंखों की समस्याएं 3 महीने से लेकर 3 साल तक बनी रहीं। इनमें से करीब एक-तिहाई लोग इतने परेशान थे कि उन्हें पूरी तरह या आंशिक रूप से नौकरी से छुट्टी लेनी पड़ी।
कुछ लोगों की हालत ऐसी तक हो गई थी कि वे पढ़ाई जारी नहीं रख पाए या काम पर नहीं जा सके। उनके लिए किताब या कंप्यूटर पर लिखा हुआ शब्द पढ़ना कठिन हो रहा था।
लाइट सेंसिटिविटी और तंत्रिका तंत्र में सूजन की दिक्कत
ऐसे लोगों ने बताया कि आंखों में लगातार असहजता रहती है। तेज रोशनी आंखों में चुभती हैं, जिसे मेडिकल भाषा में लाइट सेंसिटिविटी कहा जाता है। कई लोगों को आंखों में तेज दर्द रहता था और उन्हें किसी एक चीज पर नजर टिकाकर देखने या फोकस करने में भी काफी परेशानी होती थी।
सबसे हैरान करने वाली बात यह थी कि जब इन मरीजों की सामान्य आंखों की जांच की गई तो रिपोर्ट बिल्कुल सामान्य आई। डॉक्टरों को आंखों में कोई ऐसी खराबी दिखाई नहीं दी जिससे इन लक्षणों की वजह समझाई जा सके। यही कारण था कि मरीजों को न तो बीमारी का सही कारण बताया जा सका और न ही कोई स्पष्ट डायग्नोसिस हो पाया।
- इसके बाद वैज्ञानिकों ने इन 100 लोगों की तुलना 32 ऐसे लोगों से की जिन्हें कोरोना तो हुआ था, लेकिन बाद में आंखों की कोई परेशानी नहीं हुई।
- शोधकर्ताओं ने विशेष तरह की जांचें कीं। इन जांचों से पता चला कि जिन लोगों को आंखों की समस्या थी, उनकी आंखों और दिमाग से जुड़े तंत्रिका तंत्र में लंबे समय से सूजन बनी हुई थी। साथ ही आंखों के कई ऐसे काम प्रभावित हो चुके थे जिन्हें दिमाग से आने वाली नसें नियंत्रित करती हैं।
आंखों के लक्षणों पर गंभीरता से दें ध्यान
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क्या कहते हैं विशेषज्ञ?
नेचर कम्युनिकेशन जर्नल में प्रकाशित इस अध्ययन के प्रमुख शोधकर्ता और लिंकोपिंग यूनिवर्सिटी में ऑप्थैल्मोलॉजी के प्रोफेसर नील लगाली कहते हैं, जिन लोगों को ये समस्याएं थीं, उनकी बीमारी सामान्य जांच में पकड़ में ही नहीं आ रही थी। इसके लिए विशेष जांच करनी पड़ी। जब ये जांच की गईं, तब जाकर सभी लक्षणों की वजह समझ में आई ।
- मरीजों में प्रोटिओमिक्स टेस्ट किया गया। आसान भाषा में कहें तो इसमें आंसुओं में मौजूद अलग-अलग तरह के प्रोटीन की जांच की जाती है। जिससे पता चलता है कि शरीर में सूजन है या नसों को नुकसान पहुंचा है।
- जांच में पाया गया कि मरीजों के आंसुओं में ऐसे प्रोटीन का असामान्य पैटर्न मौजूद था जो नसों और शरीर के इम्यून सिस्टम को नियंत्रित करते हैं। हैरानी की बात यह रही कि यही बदलाव पहले गंभीर और जानलेवा कोरोना संक्रमण वाले मरीजों में भी देखे जा चुके हैं।
शोध में यह भी सामने आया कि जिन लोगों को तेज रोशनी से परेशानी हो रही थी, उसकी वजह उनकी आंखों की पुतलियों को नियंत्रित करने वाली नसों का नुकसान हुआ था। सामान्य स्थिति में पुतली तेज रोशनी में छोटी हो जाती है ताकि आंख में कम रोशनी जाए। लेकिन नसों के खराब होने की वजह से उनकी पुतली ठीक से सिकुड़ नहीं रही थी और आंखों में जरूरत से ज्यादा रोशनी पहुंच रही थी।
यही कारण था कि मरीजों को तेज रोशनी चुभती थी, सिरदर्द होता था और किसी चीज पर ध्यान केंद्रित करना मुश्किल हो जाता था।
लॉन्ग कोविड का देखा जा रहा है असर
शोधकर्ताओं का कहना है कि कुछ लोगों में कोरोना संक्रमण के बाद आंखों में लंबे समय तक सूजन बनी रहती है और आंखों की नसों को नुकसान पहुंच सकता है। नसों को हुए नुकसान की वजह से कुछ लोगों में भेंगापन जैसी समस्या भी देखी गईं।
अभी यह अध्ययन केवल स्वीडन के कुछ मरीजों पर किया गया है। यदि बड़े स्तर पर इसी तरह की जांच की जाए तो दुनिया भर में ऐसे और भी मरीज सामने आ सकते हैं।
प्रोफेसर नील लगाली ने कहा कि सबसे जरूरी बात यह है कि इस समस्या को गंभीरता से पहचाना जाए। दुनियाभर में बहुत से लोग इन समस्याओं से जूझ रहे हैं। फिलहाल यह साफ नहीं है कि इसका पक्का इलाज क्या होगा। शोधकर्ताओं को उम्मीद है कि भविष्य में इस रिसर्च के आधार पर बेहतर इलाज विकसित किए जा सकेंगे और समय के साथ मरीजों की परेशानी कम होगी।
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स्रोत:
Researchers develop diagnostic model to detect COVID-related eye problems
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