बच्चों के बेहतर सेहत के लिए उनका समय-समय पर टीकाकरण कराते रहना बहुत जरूरी है, यह उन्हें गंभीर संक्रमण और कई प्रकार की जानलेवा बीमारियों से सुरक्षित रखने में मदद करता है। टीकाकरण का ही प्रभाव है कि दो-तीन दशक पहले तक जिन बीमारियों के कारण बच्चों में सबसे अधिक मृत्यु के मामले देखे जाते रहे थे,वह अब लगभग न की स्थिति में हैं।
विशेषज्ञ बताते हैं, बच्चों को जन्म से लेकर 16 साल तक नियमित अंतराल पर टीकाकरण की आवश्यकता होती है। जन्म के समय बैसिलस कैलमेट-गुएरिन (बी.सी.जी), पोलियो की पहली खुराक, हेपेटाइटिस बी के टीके लगाए जाते हैं। पोलियो की ओरल वैक्सीन बच्चों को पांच साल की उम्र तक दी जाती है। यह उनमें लकवे की समस्या को दूर रखने में मदद करती है। भारत फिलहाल पोलियो मुक्त देशों की सूची में है। कई बीमारियों पर टीकाकरण के ही चलते भारत ने बेहतर ढंग से नियंत्रण भी पा लिया है।
जन्म के छठवें माह में पोलियो की दूसरी खुराक दी जाती है। यह टीका पोलियो वायरस से बचाता है जो अत्यधिक संक्रामक रोग है और तंत्रिका तंत्र को प्रभावित कर लकवा का कारण बनता है। यह वायरस मुख्य रूप से 5 साल से कम उम्र के बच्चों को प्रभावित करता है।
छठे महीने में पेंटावैलेंट टीका भी दिया जाता है, यह टीका पांच घातक रोगों गलघोंटू, परटूसिस (काली खांसी), टेटनेस, हेपेटाइटिस बी और हिमोफिलस इन्फ्लुएंजा टाइप बी (हिब) से सुरक्षा देता है। इसके साथ रोटावायरस और न्यूमोकोकल कॉन्जुगेट वैक्सीन भी दी जाती है।
दसवें महीने पेंटावैलेंट का दूसरा टीका, पोलियो, रोटावायरस का टीका दिया जाता है। समयवर ये टीके रिपीट किए जाते हैं।
नौंवे से 12वें महीने में खसरा और रूबेला, जापानी इंसेफेालइटिस और फिर 16-24वें महीने में इन टीको को दोबारा दिया जाता है।
बच्चों को पांच से छह साल के दौरान डिप्थीरिया पर्टुसिस और टेटनस का बूस्टर डोज, 10वें साल में टेटनस और एडल्ट डिप्थीरिया और 16वें साल में एक बार फिर से एडल्ट डिप्थीरिया की खुराक दी जाती है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञ बताते हैं ये टीके सभी बच्चों को दिए जाने बहुत आवश्यक हैं, सभी माता-पिता इनकी खुराक समय पर मिले, यह जरूर सुनिश्चित करें। बच्चों को कई प्रकार की गंभीर बीमारियों के जोखिम से बचाने और उनमें मृत्युदर को कम करने के लिए टीकाकरण आवश्यक है। देश के सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों पर ज्यादातर टीके मुफ्त उपलब्ध होते हैं।
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