सुप्रीम कोर्ट के वकील विवेक नारायण शर्मा कहते हैं कि कई मामलों में जब भी कोई महिला किसी पुरुष के विरुद्ध मुकदमा दायर करती है तो प्राथमिकी दर्ज होते ही पुरुष के खिलाफ शोर-शराबा होने लगता है। परिवार को नुकसान पहुंचता है, मानहानि होती है, नौकरी भी चली जाती है। ऐसी भी परिस्थितियां बनती है कि पुरुष आत्महत्या कर लेते हैं।
क्राइम ब्रांच में एसीपी रह चुके भानुप्रताप बार्गे भी मानते हैं कि आईपीसी की धारा 498ए में संशोधन होना चाहिए। आंकड़ों के आधार पर वे बताते हैं कि देश में करीब इसके एक लाख मामले दर्ज हैं। इससे परिवार बर्बाद हो रहे हैं, इसलिए इसमें संशोधन की जरूरत है।
सुप्रीम कोर्ट ने भी दहेज कानून के दुरुपयोग पर चिंता जताई है। कोर्ट ने माना है कि इससे लोगों को परेशान किया जा रहा है। सिर्फ शिकायत के आधार पर गिरफ्तारी न हो। इस संबंध में राज्य सरकारें पुलिस को निर्देश जारी करे। पुलिस गिरफ्तारी की जरूरत देखे और मजिस्ट्रेट गैरकानूनी गिरफ्तारियां रोके। हिरासत बढ़ाने से पहले सबूत देखे।
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के आधार पर पत्रकार जागृति शुक्ला बताती हैं कि शादीशुदा महिलाओं से ज्यादा शादीशुदा पुरुषों के खुदकुशी करने के मामले काफी ज्यादा हैं। वह कहती हैं कि नारी सशक्तीकरण का मतलब पुरुषों से नफरत करना नहीं हो सकता।
फिल्मकार मनीष गुप्ता कहते हैं कि पुरुषों के प्रति द्वेष और पूर्वाग्रहों से ग्रसित नारीवाद उतने ही खतरनाक हैं, जितना कि नारियों के प्रति। भारतीय संविधान समान कानून की बात करता है, इसलिए सभी पुरुषों और महिलाओं को मिलकर लैंगिक समानता के लिए प्रयास करने चाहिए।
क्या हम कोई ऐसा कानून नहीं ला सकते जिससे यौन अपराधों के आरोपी पुरुषों की पहचान छिपी रहे, जबतक वह दोषी करार नहीं दिया जाता? क्या समाज में उनकी सुरक्षा के लिए कोई प्रयास नहीं होना चाहिए? डॉक्यूमेंट्री हमें और भी कई सवालों के साथ छोड़ जाती है।