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Child Health: लॉकडाउन के दौरान पैदा हुआ था आपका बच्चा, उसे भी तो नहीं हो रहीं ये दिक्कतें? माता-पिता ध्यान दें

Sat, 18 Jul 2026 08:10 PM IST
अभिलाष श्रीवास्तव हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

शेषज्ञों का मानना है कि बच्चे का शुरुआती सामाजिक अनुभव उसके दिमाग के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। कोरोना लॉकडाउन के दौरान जन्मे बच्चों को फोकस बनाने सहित कई तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। सभी माता-पिता को ये रिपोर्ट जरूर पढ़नी चाहिए।
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लॉकडाउन के दौरान पैदा हुए बच्चों पर असर - फोटो : Amarujala.com/AI
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विस्तार
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कोरोना महामारी को कई साल बीत चुके हैं। अब मास्क उतर गए हैं और जिंदगी लगभग सामान्य हो चुकी है। लेकिन सवाल यह है कि क्या महामारी का असर भी पूरी तरह खत्म हो गया? जवाब है- नहीं। कोरोनावायरस लगातार म्यूटेट होकर नए वैरिएंट्स के साथ सामने आता रहा है। अमर उजाला में प्रकाशित हालिया रिपोर्ट में हमने अकेले जून महीने में ही चीन में सामने आए करीब 80 हजार मामलों की जानकारी दी थी। भारत में भी कोरोना फिर से दस्तक देता दिख रहा है, यहां 1-16 जुलाई तक करीब 339 लोगों में संक्रमण की पुष्टि हुई है।

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कोरोना के मामलों के अलावा 2020-23 की महामारी के कारण हुए दुष्प्रभावों को लेकर भी विशेषज्ञ लगातार चिंता जताते रहे हैं। इसी से संबंधित एक हालिया रिपोर्ट में शोधकर्ताओं ने उन बच्चों के दिमागी विकास को लेकर चिंता जताई है, जिनका जन्म कोरोना महामारी और लॉकडाउन के दौरान हुआ था।

इंग्लैड में किए गए अध्ययन में पाया गया है कि लॉकडाउन के दौरान जन्मे बच्चे, अब करीब चार साल की उम्र तक पहुंचने पर भी उनमें ध्यान केंद्रित करने, निर्देशों का पालन करने, अपनी भावनाओं को नियंत्रित करने और किसी काम को पूरा करने में कठिनाई हो रही है। विशेषज्ञों ने कहा, ऐसे बच्चों के माता-पिता को अलर्ट रहने की जरूरत है।
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ये भी पढ़िए- (कान में रहने वाले दर्द ने कैसे ले ली 21 साल के कलाकार की जान? आपकी आंखें खोल देगी ये रिपोर्ट)

कोविड के दौरान पैदा हुए बच्चों के ब्रेन पर असर - फोटो : Freepik.com
आसपास के माहौल पर भी निर्भर करता है बच्चों का विकास

स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, बच्चे अपने जीवन के शुरुआती वर्षों में सबसे ज्यादा सीखते हैं। इनमें सिर्फ उनके माता-पिता ही नहीं, बल्कि दादा-दादी, पड़ोसियों, दूसरे बच्चों, शिक्षकों और आसपास के माहौल का भी बड़ा रोल होता है। हालांकि लॉकडाउन में जन्मे लाखों बच्चों को यह सामान्य माहौल कभी मिला ही नहीं। उनका बचपन घर की चार दीवारों तक सीमित रहा। बाहर की दुनिया से उनका परिचय काफी देर से हुआ। 

इंग्लैंड के सिटी सेंट जॉर्ज यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन के शोधकर्ताओं ने 23 मार्च से 23 जून 2020 के बीच पहले लॉकडाउन में जन्मे 205 बच्चों का अध्ययन किया।
 
  • शोध में पाया गया कि इन बच्चों में एक्जीक्यूटिव फंक्शन का स्तर अपेक्षाकृत कम था।
  • आसान भाषा में समझें तो यह दिमाग की वह क्षमता होती है, जिसकी मदद से बच्चा योजनाएं बनाता है, समस्याओं का हल निकालता है, नई परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढालता है, ध्यान केंद्रित रखता है और सही समय पर सही निर्णय लेने की कोशिश करता है।
  • विशेषज्ञों ने चेताया है कि इसका असर बच्चों को दीर्घकालिक तौर पर परेशान करने वाला हो सकता है।

कोविड के दौरान पैदा हुए बच्चे - फोटो : Freepik.com
लॉकडाउन के दौरान जन्मे बच्चों पर अध्ययन

जर्नल आर्काइव्स ऑफ डिजीज इन चाइल्डहुड में प्रकाशित
यह अध्ययन लॉकडाउन के दौरान जन्मे और अब स्कूल जाने की उम्र तक पहुंच चुके बच्चों पर किया गया पहला बड़ा अध्ययन है।

इस रिपोर्ट में शोधकर्ताओं ने बताया इस समूह के बच्चों पर आगे भी लगातार नजर रखने की जरूरत है, क्योंकि आने वाले वर्षों में इनके विकास को बेहतर समझा जा सकेगा। स्कूलों और परिवारों को ऐसे बच्चों की मदद के लिए अतिरिक्त संसाधनों और विशेष सहयोग की आवश्यकता पड़ सकती है, ताकि उनकी सीखने और व्यवहार से जुड़ी जरूरतों को पूरा किया जा सके।

अध्ययन के दौरान क्या पता चला?
 
  • शोध के दौरान विशेषज्ञों ने बच्चों की भाषा क्षमता और नॉन-वर्बल रीजनिंग की जांच की। नॉन-वर्बल रीजनिंग का मतलब है बिना भाषा का सहारा लिए तस्वीरों, आकृतियों या पैटर्न को देखकर सोचने, समझने और समस्या हल करने की क्षमता।
  • इसके अलावा माता-पिता से भी विस्तृत सवाल पूछे गए। 
  • उनसे बच्चों की भावनाओं को नियंत्रित करने की क्षमता, याददाश्त, व्यवस्थित तरीके से काम करने की आदत, बिना मदद के समस्या सुलझाने की क्षमता और पूरे दिन की शरीर की गतिविधियों के बारे में जानकारी ली गई।

नतीजों में पता चला कि अध्ययन में शामिल लगभग हर तीन में से एक बच्चे में एक्जीक्यूटिव फंक्शन से जुड़ी कठिनाइयां देखी गईं।

बच्चों की एक्जीक्यूटिव फंक्शनिंग महामारी से पहले के सामान्य स्तर से कम थी। इतना ही नहीं, बच्चों की सोचने-समझने की क्षमता (नॉन-वर्बल रीजनिंग) को देखते हुए भी उनका प्रदर्शन उम्मीद से कमजोर था। बच्चों की अपने विचारों और भावनाओं को शब्दों में व्यक्त करने की क्षमता भी कमजोर थी।
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बच्चों के दिमागी विकास पर असर - फोटो : Freepik.com
क्या कहते हैं विशेषज्ञ?

शोधकर्ताओं का मानना है कि रिसेप्टिव लैंग्वेज यानी दूसरों की बात समझने की क्षमता शायद इसलिए बेहतर रही, क्योंकि लॉकडाउन के दौरान माता-पिता और देखभाल करने वालों ने बच्चों के साथ ज्यादा समय बिताया और उनसे अधिक बातचीत की।

लेकिन बच्चों को बोलकर अपनी बात कहने की क्षमता पर असर पड़ सकता है, क्योंकि बच्चों को परिवार के बाहर अलग-अलग लोगों से मिलने, बातचीत करने और नए सामाजिक अनुभव लेने का अवसर बहुत कम मिला।

जहां तक शारीरिक विकास का सवाल है, बच्चों की मोटर स्किल्स  यानी शरीर और हाथ-पैरों की गतिविधियों से जुड़ी क्षमताएं उनकी उम्र के हिसाब से सामान्य पाई गईं।

अभी विस्तृत अध्ययन की जरूरत

शोधकर्ताओं ने कहा कि ये बस ऑब्जर्वेशनल स्टडी है, जिसमें केवल बच्चों का अवलोकन किया गया है। इसलिए यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि बच्चों में दिखे बदलावों की वजह सिर्फ लॉकडाउन ही है। चूंकि इन बच्चों की तुलना उसी उम्र के ऐसे बच्चों से नहीं की गई जो लॉकडाउन के दौरान से पहले पैदा हुए थे, ऐसे में इसे सिर्फ अवलोकन की दृष्टि से देखा जाना चाहिए। 
 
  • एक और सीमा यह भी रही कि अध्ययन में शामिल परिवारों ने अपनी इच्छा से भाग लिया था। हालांकि इनमें इंग्लैंड के अलग-अलग इलाकों, सामाजिक वर्गों और विभिन्न जातीय पृष्ठभूमि के परिवार शामिल थे।
  • फिर भी अध्ययन में शामिल परिवारों का शिक्षा स्तर सामान्य आबादी से अधिक था। करीब 75 प्रतिशत माता-पिता ग्रेजुएट थे। 

शोधकर्ताओं का कहना है कि इससे परिणामों को और बेहतर तरीके से समझने के लिए और विस्तृत अध्ययन की आवश्यकता है।



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स्रोत:
Developmental outcomes in 4-year-old children born in the first COVID-19 lockdown in England: preliminary findings from the Born In COVID Year – Core Lockdown Effects (BICYCLE) study 


अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।
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