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किस बीमारी के लिए बनी थी दुनिया की पहली वैक्सीन, भारत में जिसका प्रचार इन रानियों ने किया था

Tue, 22 Sep 2020 02:58 PM IST
सोनू शर्मा बीबीसी हिंदी
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
वर्ष 1805 में जब देवजमनी पहली बार कृष्णराज वाडियार तृतीय से शादी के लिए मैसूर के शाही दरबार में पहुंचीं, तब उन दोनों की उम्र 12 साल थी। कृष्णराज वाडियार तृतीय दक्षिण भारत के एक राज्य से नए-नए शासक बने थे। पर देवजमनी को जल्द ही पता चल गया था कि उन्हें एक बड़े और महत्वपूर्ण काम के लिए चुना गया है और ये काम चेचक के टीके का प्रसार और प्रचार करना था। कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के इतिहासकार डॉक्टर नाइजल चांसलर के अनुसार, लोगों में चेचक के टीके का प्रचार-प्रसार करने के लिए और उन्हें इसके इस्तेमाल के लिए प्रोत्साहित करने के मकसद से ईस्ट इंडिया कंपनी ने देवजमनी की भूमिका को एक पेंटिंग के रूप में उतारा। 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
तब चेचक का इलाज काफी नया था। छह साल पहले ही अंग्रेज डॉक्टर एडवर्ड जेनर ने इसकी खोज की थी और भारत में इसे काफी संदेह के साथ देखा जाता था। कुछ जगहों पर इस टीके के खिलाफ खुला प्रतिरोध भी देखने को मिला, जिसका एक कारण यह भी था कि 19वीं सदी आते-आते ईस्ट इंडिया कंपनी भारत में अपनी जड़ें मजबूत कर चुकी थी। लेकिन ब्रितानी भारत में चेचक का टीकाकरण करने के अपने 'बड़े सपने' को दरकिनार करने के लिए तैयार नहीं थे। अंग्रेजों की दलील थी कि हर साल बहुत सी जिंदगियां चेचक की भेंट चढ़ जाती हैं, जिन्हें टीका की मदद से बचाया जा सकता है।  

इसके बाद ईस्ट इंडिया कंपनी सत्ता, ताकत और राजनीति का इस्तेमाल करते हुए दुनिया के सबसे पहले टीके को भारत लेकर आई। इस योजना में ब्रितानी सर्जन, भारतीय टीकाकर्मी, टीका बनाने वाली कंपनी के मालिक और मित्र शासक शामिल थे। इन मित्र शासकों में सबसे ऊपर वाडियार वंश का नाम आता है, जिन्हें ब्रितानियों ने तीस साल के देश निकाले के बाद वापस राज गद्दी पर बिठाया था। 
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चेचक के टीके का प्रचार करने वाली भारतीय रानियां - फोटो : SOTHEBY'S/BBC
पेंटिंग में दिखने वाली ये महिलाएं कौन?

डॉक्टर चांसलर की राय है कि 'यह पेंटिंग जो लगभग 1805 की है, सिर्फ रानी की भूमिका को ही नहीं दिखाती, बल्कि हमें यह समझने का मौका भी देती है कि ब्रितानियों ने किस तरह के प्रयास किए।' इस तस्वीर को अंतिम बार, साल 2007 में अंतरराष्ट्रीय नीलामी घर सौदेबी द्वारा बिक्री के लिए पेश किया गया था। तब तक इस तस्वीर में दिखने वाले पात्रों को लोग नहीं जानते थे। कुछ को लगता था कि ये महिलाएं पेशेवर नृत्यांगनाएं हैं, पर डॉक्टर चांसलर इस तस्वीर की पृष्ठभूमि पर लगातार प्रकाश डालते रहे। 

उन्होंने तस्वीर में सबसे दाहिनी ओर खड़ी महिला की पहचान देवजमनी के तौर पर की, जो सबसे छोटी राजकुमारी थीं। डॉक्टर चांसलर का कहना है कि देवजमनी की साड़ी सामान्य परिस्थिति में उनकी दाईं बाजू को ढक रही होती, मगर उन्होंने इस तस्वीर में अपने हाथ से साड़ी को हटाया हुआ है, ताकि वे दिखा सकें कि उन्हें टीका कहां लगाया गया। बाईं ओर खड़ी महिला राजा की पहली पत्नी हैं, जिनका नाम भी देवजमनी था। तस्वीर में उनकी नाक और होठों के आसपास का हिस्सा कुछ सफेद दिखाई देता है। यह आमतौर पर उन लोगों में देखने को मिलता है, जिन्हें चेचक के वायरस से सीमित तरीके से एक्सपोज किया गया हो। 

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
ठीक हो चुके चेचक के मरीजों के शरीर पर जो पस भरे दाने होते थे, उन्हें निकाला जाता था और उन्हें सुखाकर पीस लिया जाता था। इसके बाद स्वस्थ लोगों की नाक के पास इसकी धूल को उड़ाया जाता था। इस तरीके से किए जाने वाले टीकाकरण को 'वैरीओलेशन' कहा जाता है, जिससे व्यक्ति को हल्का इनफेक्शन होता है। 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
रानी के टीकाकरण से क्या प्रभाव पड़ा?

डॉक्टर चांसलर ने अपने इस अनुमान को सही ठहराते हुए एक लेख लिखा था जो 2001 में प्रकाशित हुआ था। उनके मुताबिक, पेंटिंग बनाने की तारीख वाडियार राजा की शादी की तारीख से मिलती है और जुलाई 1806 के शाही दरबार के रिकॉर्ड से यह पता चलता है कि जो लोग उस दौर में टीका लगवाने के लिए आगे आए थे, उन पर देवजमनी के टीकाकरण का काफी प्रभाव पड़ा था। यानी यह माना गया कि जब रानी ने टीका लगवा लिया, तो वो भी ऐसा कर सकते हैं। 

साथ ही मैसूर इतिहास के जानकार के तौर पर डॉक्टर चांसलर का मानना है कि सोने के भारी कड़े और सिर पर पहने जाने वाले शानदार आभूषण वाडियार रानियों की खास पहचान रहे हैं। थॉमस हिकी एक ऐसे कलाकार हैं जिन्होंने वाडियार राजवंश और दरबार के दूसरे शाही सदस्यों की और भी तस्वीरें बनाई हैं। जिस समय यह तस्वीर बनाई गई, वो ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए भारत में अच्छा समय था। 1799 में उन्होंने अपने आखिरी बड़े दुश्मनों में से एक मैसूर के राजा टीपू सुल्तान को हराया और उनकी जगह वाडियार राजवंश को दे दी, पर तब भी ब्रितानियों का प्रभाव पूरी तरह से स्थापित नहीं हो पाया था। डॉक्टर चांसलर के अनुसार, विलियम बेंटिक जो उस समय मद्रास के गवर्नर थे, उन्होंने इस खतरनाक बीमारी से लड़ने को एक राजनीतिक अवसर के तौर पर देखा। 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
चेचक की बीमारी और धार्मिक मान्यताएं

इतिहासकार प्रोफेसर माइकल बैनेट जिन्होंने 'वॉर अगेंस्ट स्मॉलपॉक्स' नामक किताब लिखी है, उन्होंने अपनी किताब में अंग्रेजों द्वारा विकसित चेचक के टीके की भारत आने की कहानी का भी जिक्र किया है। वे कहते हैं, 'ब्रितानी भारत में इस टीके को लोकप्रिय बनाना चाहते थे ताकि यहां की जनता को चेचक से बचाया जा सके।' 

भारत में उस समय चेचक की संक्रमण दर बहुत ज्यादा थी और उससे होने वाली मौतों की दर भी बढ़ी हुई थी। इस बीमारी के लक्षण थे- बुखार आना, शरीर में दर्द होना और पूरे शरीर पर पस भरे दानों के फूटने की वजह से तकलीफ होना। जो लोग इस बीमारी में मौत से बच भी जाते थे, उनके शरीर पर जिंदगी भर के लिए चेचक के दाग पड़ जाते थे। दशकों तक इस बीमारी का इलाज वैरीओलेशन और धार्मिक प्रथाओं से किया जाता था। हिंदू इसे चेचक माता मरियम्मा या शीतला माता का प्रकोप मानते थे और उनकी पूजा करते थे। 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
टीके के नाम की तलाश

इस वजह से जब वैक्सीन (टीका) आई, जिसमें 'काउ-पॉक्स' यानी गाय में होने वाली चेचक का अंश भी था, तो इसे स्वीकार नहीं किया गया और ब्राह्मण 'टीकादारों' ने इस टीके का विरोध किया, क्योंकि ये उनकी जीविका के लिए खतरा था। प्रोफेसर बैनेट कहते हैं, 'सबसे बड़ी चिंता यह थी कि कोई अपने स्वस्थ बच्चे को जानवरों में होने वाली बीमारी से विकसित टीका लगवाना नहीं चाहता था।'

वे बताते हैं कि 'काउ-पॉक्स का स्थानीय भाषा में अनुवाद करना उनके लिए सरल नहीं था। इस काम के लिए उन्होंने संस्कृत के जानकारों को भी बुलाया, पर वो जो शब्द इस्तेमाल कर रहे थे, वह चेचक से कहीं ज्यादा बुरी बीमारी के लिए प्रतीत होता था। और तो और लोगों में इस बात का डर फैल गया कि काउ-पॉक्स से कहीं उनके मवेशियों को नुकसान ना पहुंचे।' 

एक और बड़ी समस्या यह थी कि इस टीके को देने का सबसे असरदार तरीका यह था कि पहले एक स्वस्थ व्यक्ति की बांह पर सुई से इस टीके को लगाया जाए और एक सप्ताह बाद जब उस जगह पर काउ-पॉक्स का फोड़ा निकल आए तो डॉक्टर उसका पस निकालकर, दूसरे स्वस्थ व्यक्ति के हाथ पर लगा दें। 

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
टीके की भारत यात्रा

इस तरीके से यह टीका हर तरह के जाति, धर्म, लिंग और नस्ल के लोगों से एक-दूसरे में ट्रांसफर हो रहा था जो हिंदुओं में 'पवित्रता' की विचारधारा से मेल नहीं खाता। इन सारी समस्याओं से निपटने का इससे बेहतर तरीका क्या हो सकता था कि हिंदू राजवंश की मदद ली जाए, जिनकी सत्ता की ताकत उनकी वंशावली या उनके खून से जुड़ी है। भारत में वाडियार रानी तक पहुंचने वाले टीके की यात्रा एक ब्रितानी नौकर की तीन साल की बच्ची से शुरू हुई, जिसका नाम एना डस्टहॉल था। भारत में इस बच्ची को 14 जून 1802 को सफलतापूर्वक चेचक का टीका दिया गया था। भारतीय उप-महाद्वीप में लगने वाले सारे टीके इसी बच्ची से शुरू हुए। 

एना के टीकाकरण के एक सप्ताह बाद, उनकी बांह से पस निकालकर पांच और बच्चों को चेचक का टीका दिया गया। इसके बाद टीका पूरे भारत में लगाया जाने लगा और हैदराबाद, कोच्चि, चिंगलेपट और मद्रास से होते हुए यह मैसूर के शाही दरबार में पहुंचा। 

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
वाडियार राजवंश का समर्थन

डॉक्टर चांसलर बताते हैं कि इस बात की कोई जानकारी नहीं है कि रानी देवजमनी को टीका किस प्रकार लगाया गया था। ना ही इस बात के बारे में ही कुछ लिखा गया है कि उनके अलावा वाडियार राजवंश के किसी और शाही सदस्य को यह टीका दिया गया था या नहीं। हालांकि, ऐसा होना आश्चर्यजनक नहीं होगा कि राजवंश के अन्य लोगों को भी यह टीका दिया गया हो, क्योंकि दूसरे राजवंशों में इस टीके के प्रयोग के साक्ष्य मिलते हैं। पर किसी भी राजवंश ने इसे तस्वीर के तौर पर नहीं उकेरा। 

डॉक्टर चांसलर के मुताबिक, इस राजनीतिक कदम का श्रेय राजा की दादी लक्ष्मी अम्मानी को जाता है, जिन्होंने अपने पति को चेचक की वजह से खो दिया था। उनका मानना है कि इस तस्वीर में जो महिला बीच में खड़ी हैं, वो लक्ष्मी अम्मानी ही हैं, जिनका इस तस्वीर में होना इस बात का प्रतीक है कि वाडियार राजवंश इस टीकाकरण के समर्थन में था। 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
कुछ वर्षों में लाखों लोगों ने लगवाया टीका

डॉक्टर चांसलर का कहना है कि यह पेंटिंग शायद इसीलिए बन पाई, क्योंकि वे (लक्ष्मी अम्मानी) निर्णायक भूमिका में थीं। उस समय राजा और रानियां, दोनों ही इस तस्वीर को मना करने के लिए बहुत छोटे रहे होंगे। जैसे-जैसे लोगों को इस टीकाकरण की प्रक्रिया के फायदों के बारे में पता चलता गया, वैसे-वैसे लोग इसे अपनाते गए और बहुत सारे टीकादार वैरीओलेशन प्रक्रिया से टीकाकरण की ओर जाने लगे। 

प्रोफेसर बैनेट का अंदाजा है कि 1807 तक भारत में दस लाख से ज्यादा टीके लग चुके थे। समय के साथ यह तस्वीर ब्रिटेन पहुंच गई और लोगों की नजरों से दूर हो गई। यह वापस 1991 में तब संज्ञान में आई, जब डॉक्टर चांसलर ने इसे एक प्रदर्शनी में देखा और इसे गुमनामी से निकालकर दुनिया के पहले कुछ 'इम्युनाइजेशन कैंपेन' यानी टीकाकरण अभियानों के रूप में इसकी पहचान बनाई। 
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