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एडीएचडी: तीन महीने में 4 लाख से ज्यादा लोगों को डॉक्टरों ने लिखी दवा, अब सामने आया इसका गंभीर खतरा

Sun, 13 Sep 2026 01:15 PM IST
अभिलाष श्रीवास्तव हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

ब्रिटेन में एडीएचडी की दवाएं लेने वाले मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ी है। तीन महीने में करीब 3.95 लाख मरीजों को दवा दी गई, जबकि एक साल में 40 प्रतिशत से ज्यादा वृद्धि हुई। 
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एडीएचडी को लेकर बड़ा खुलासा - फोटो : Amarujala.com/AI
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विस्तार
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एडीएचडी यानी अटेंशन डेफिसिट हाइपरएक्टिविटी डिसऑर्डर, पिछले एक दशक में इस समस्या के शिकार लोगों के मामलों में काफी तेजी से बढ़ोतरी दर्ज की गई है। ये एक तरह की न्यूरो-डवलपमेंटल यानी मस्तिष्क के विकास से जुड़ी समस्या है जिसके कारण लोगों को ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई होती है और एक काम पर ज्यादा देर तक टिके रहने में दिक्कत हो सकती है।

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कुछ दशकों पहले तक इस समस्या के बारे में लोगों के बीच जानकारी और जागरूकता दोनों की कमी थी, लिहाजा इसे दिमाग की चंचलता मान लिया जाता था। हालांकि अब जानकारी बढ़ने के साथ बड़ी संख्या में लोग एडीएचडी की जांच करा रहे हैं और जरूरत पड़ने पर दवाएं भी शुरू कर रहे हैं।

एडीएचडी के इलाज को लेकर ब्रिटेन से सामने आए ताजा आंकड़े बताते हैं कि यह बदलाव कितना बड़ा हो चुका है? सिर्फ ब्रिटेन में ही केवल तीन महीने में (अप्रैल से जून के बीच) करीब 3.95 लाख लोगों को एडीएचडी की दवाएं दी गईं, इनमें 41 हजार से ज्यादा नए मामले भी शामिल हैं। दस साल पहले जहां केवल 81 हजार मरीज ऐसी दवाएं ले रहे थे, वहीं अब यह आंकड़ा करीब पांच गुना हो चुका है। यानी एडीएचडी की पहचान और उसके इलाज की तस्वीर कुछ ही वर्षों में तेजी से बदल गई है।
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पर क्या ये दवाएं सभी लोगों के लिए सुरक्षित मानी जा सकती हैं? विशेषज्ञों ने दवाओं के दूसरे पहलू को लेकर जो बातें बताई हैं वह और भी चिंता बढ़ाने वाली हो सकती हैं।

बच्चों में एडीएचडी की समस्या - फोटो : Amarujala.com/AI
भारत में एडीएचडी के मामले

एडीएचडी एक ऐसी स्थिति है जो  जिसमें मरीज के लिए किसी एक काम पर ध्यान लगाने, काम को जारी रखने और अपने व्यवहार को नियंत्रित करने में कठिनाई हो सकती है। मरीजों का ध्यान भटकता रहता है, चीजें भूल जाती और दिए गए निर्देशों का पालन करने में परेशानी हो सकती हैं।

भारत भी एडीएचडी की समस्या से परेशान देखा जा रहा है।
 
  • आंकड़ों पर नजर डालें तो पता चलता है कि भारत में 1.6% से 17.9% बच्चों में अटेंशन डेफिसिट हाइपरएक्टिविटी डिसऑर्डर के मामलों का पता चला है।
  • हाल की क्लिनिकल रिपोर्टों में कोरोना महामारी के बाद इसके लक्षणों की पहचान में तेजी से बढ़ोतरी देखी गई है।
  • अलग-अलग राज्यों में किए गए अध्ययनों से पता चलता है कि महाराष्ट्र के कुछ हिस्सों में इसकी दर 1.5%, तो कर्नाटक जैसे इलाकों में 14% से ज्यादा है।
 
ब्रिटेन में अनुमान है कि करीब 25 लाख लोगों को एडीएचडी हो सकता है, लेकिन ज्यादातर का अभी तक आधिकारिक रूप से निदान नहीं हुआ है। दूसरी ओर, जांच के लिए लाखों रेफरल लंबित हैं। इस बीच कुछ अध्ययनों में चिंता जताई जा रही है कि एडीएचडी की दवाओं के इस्तेमाल के साथ इनके संभावित दुष्प्रभावों पर भी नजर रखी जानी चाहिए। खासतौर पर उन लोगों को लेकर विशेष सावधानी बरतने की आवश्यकता है जिनमें पहले से कोई हृदय संबंधी बीमारी है।

अटेंशन डेफिसिट हाइपरएक्टिविटी डिसऑर्डर - फोटो : Freepik.com
स्टिमुलेंट दवाएं लेने वाले के बढ़ रहे आंकड़े

ब्रिटेन के विशेषज्ञों ने बताया कि  सिर्फ एक साल की बात करें तो एडीएचडी में इस्तेमाल होने वाली स्टिमुलेंट दवाएं लेने वाले मरीजों की संख्या करीब 40 प्रतिशत बढ़ी है। ये दवाएं दिमाग की सक्रियता और ध्यान केंद्रित करने की क्षमता को कंट्रोल करती हैं।
 
  • जनवरी से जून के बीच कुल 24 लाख एडीएचडी प्रिस्क्रिप्शन दिए गए।
  • इस रफ्तार को देखते हुए ब्रिटेन की नेशनल हेल्थ सर्विस यानी एनएचएस पिछले साल के रिकॉर्ड 42 लाख प्रिस्क्रिप्शन से भी आगे निकल सकती है।

विशेषज्ञ इस तेज बढ़ोतरी को लेकर भी कुछ सवाल भी उठा रहे हैं। उनका कहना है कि इसकी एक वजह ‘मेडिकलाइजेशन ऑफ डिस्ट्रेस’ भी हो सकती है। आसान भाषा में इसका मतलब है कि सामान्य तनाव, परेशानी या रोजमर्रा की मुश्किलों को भी बीमारी मानकर इलाज की जरूरत समझी जाने लगना।

विशेषज्ञों को चिंता है कि पहले जिन व्यवहारों को सामान्य माना जाता था, उन्हें अब कई बार ऐसी समस्या के रूप में देखा जा रहा है जिसके लिए मेडिकल इलाज जरूरी है।

जागरूकता बढ़ी पर चिंता भी

एडीएचडी को लेकर दुनियाभर में जागरूकता बढ़ रही है, इसके लिए सोशल मीडिया पर इन्फ्लुएंसर्स के अपने अनुभव खुलकर साझा करने को बड़ा योगदान वाला माना जा रहा है। इससे लोगों को इस समस्या के बारे में ज्यादा जानकारी मिल रही है और कई लोग अपने लक्षणों को पहचानकर जांच के लिए आगे आ रहे हैं।

एडीएचडी के लिए काम करने वाले  समूह इसे सकारात्मक बदलाव मानते हैं।  लेकिन दूसरी तरफ सरकारी अधिकारियों ने इलाज की मांग में इतनी तेज बढ़ोतरी को लेकर चिंता भी जताई है।

एनएचएस की रिपोर्ट में एडीएचडी की दवाओं पर होने वाले खर्च की जानकारी भी सामने आई है। एडीएचडी की दवाओं पर एनएचएस का खर्च करीब 12 प्रतिशत बढ़कर 5.6 करोड़ पाउंड हो गया। पिछली तिमाही में यह खर्च करीब 5 करोड़ पाउंड था।
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एडीएचडी की दवाओं को लेकर सावधानी जरूरी - फोटो : Adobe Stock Images
दवाओं के साइड-इफेक्ट्स को लेकर अलर्ट

एडीएचडी की दवाओं के बढ़ते इस्तेमाल के बीच इनके संभावित गंभीर दुष्प्रभावों को लेकर भी चिंता सामने आई है। खासतौर पर इसका हार्ट हेल्थ पर गंभीर असर सामने आया है। 

विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि एडीएचडी की दवा शुरू करने वाले कुछ मरीजों में पहले से मौजूद हृदय संबंधी समस्या भी हो सकती है। कुछ मामलों में एडीएचडी की स्टिमुलेंट दवाएं ऐसी समस्या वाले लोगों में गंभीर जटिलताओं का खतरा बढ़ा सकती हैं।
 
  • ऐसे ही एक मामल में लंदन में 28 वर्षीय जैकब वुडरसन की मौत भी हो गई थी।
  • एडीएचडी का निदान होने के करीब छह महीने बाद उनकी दवा की खुराक बढ़ाई गई थी। इसके कुछ समय बाद उनकी अचानक मौत हो गई। उन्हें सडन एरिदमिक डेथ सिंड्रोम हुआ था। 
  • आसान भाषा में समझें तो भले ही आप दिखने में स्वस्थ हो पर दिल की धड़कन में अचानक जानलेवा गड़बड़ी हो सकती है जो कार्डियक अरेस्ट और मौत का खतरा बढ़ाने वाली हो सकती है।
  •  जांच में पाया गया कि संभवत: दवा की डोज बढ़ाए जाने के कारण उनके दिल पर असर हुआ और मौत हो गई।

विशेषज्ञ कहते हैं, निश्चित ही ये अच्छे संकेत हैं कि लोग अब एडीएचडी के बारे में जान रहे हैं और डॉक्टरी मदद ले रहे हैं। पर साथ ही साथ इसके इलाज के समय डॉक्टरों को भी सावधानी बरतनी चाहिए। कुछ दवाएं गंभीर साइड-इफेक्ट्स का कारण बन सकती हैं, जिससे पहले से ही दिल की बीमारी के शिकार लोगों को खतरा हो सकता है।



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स्रोत:
ADHD: Drug prescribing in NHS continues to rise in England


अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।
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