ऋतु के अनुसार ही उपयुक्त भोजन का सेवन और रहन-सहन, उसके अनुसार चेष्टा और खानपान ऋतुचर्या है। वर्ष की छह ऋतुओं में प्रत्येक ऋतु दो माह की होती है। साधक से अपेक्षा की गई है कि वह उस समय चल रही ऋतु के अनुसार ही अपना खानपान और व्यवहार रखे।
व्यवहार या आचरण में ध्यान रहे, इसलिए समझने और ध्यान में रखने के लिहाज से प्रत्येक ऋतु का एक प्रधान रस माना गया है। ऋतुचर्या के लिए निर्धारित उसी रस के पदार्थों का अधिक सेवन करने से शरीर मन और आत्मचेतना का अच्छा पोषण होता है। इन दिनों ऋतुओं के मान से वर्षा का समय है।
आयुर्वेद के अनुसार, इन दिनों पाचन शक्ति क्षीण हो जाती है। विकृति के कारण पाचन क्रिया की कमजोरी और बढ़ती है। इसलिए जठराग्नि को जगाना, भूख और पाचन को संतुलित रखना और दोषों का शमन करना आयुर्वेद के लिहाज से महत्वपूर्ण है। इसके लिए आयुर्वेद के उपदेष्टा आसानी से पचने वाले आहार लेने की हिदायत देते हैं।
उनके अनुसार, दालें, सब्जियों का सूप, पुराना अन्न, पतला दही लिया जा सकता है। पंचकर्म में की जाने वाली शुद्धि क्रियाएं, सुगंधियों का प्रयोग भी इस ऋतु में करने का निर्देश है। दिन में सोना, ज्यादा थकना और धूप में घूमना इन दिनों मना किया गया हैं।