वैज्ञानिकों का दावा है कि इससे संतान सुख पाने की संभावना ताजा भ्रूण के मुकाबले 30 फीसदी तक बढ़ जाती है। एक शोध में कहा गया है कि फ्रोजन भ्रूण की मदद से संतान की इच्छा रखने वाले दंपति पर आईवीएफ तकनीक का कई बार इस्तेमाल संभव हो सकता है।
तुरंत भ्रूण को प्रत्यारोपित करने से हो सकती है परेशानी
महिलाओं को आई.वी.एफ तकनीक के बाद सावधानी बरतने की सलाह दी जाती है। कई वैज्ञानिकों ने बताया कि आईवीएफ तकनीक में अंडाशय से अधिक मात्रा में अंडाणु उत्पादित करने के लिए विभिन्न तरह की दवाएं दी जाती है। इसकी वजह से महिलाओं का गर्भाशय भी प्रभावित होता है। ऐसा स्थिति में तुरंत भ्रूण को प्रत्यारोपित करने से संतान सुख पाने की संभावना कम हो जाती है। अंडाणु उत्पादित करने के लिए दवा से किए गए इलाज के बाद कुछ समय का अंतर रखने से संतान पाने की संभावना बढ़ जाती है। दरअसल इस प्रक्रिया में अंडाणु को कुछ समय के लिए संरक्षित कर दिया जाता है और गर्भाशय के इलाज के दौरान इस्तेमाल की गई दवा के प्रभावों के समाप्त होने के बाद संरक्षित भ्रूण को गर्भ में आरोपित कर दिया जाता है।
इंदिरा आईवीएफ के वाराणसी सेंटर में प्रसूति एवं स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. रणविजय सिंह ने बताया कि आईवीएफ तकनीक को आम लोगों की पहुँच तक बनाने के लिए कई तरह के नए शोध किये जा रहे है | चिकित्सा जगत के पास भ्रूण की जांच के अन्य तरीके भी उपलब्ध हैं। लेकिन काफी महंगा और जटिल होने के कारण इन्हें ज्यादा उम्र और बार-बार गर्भपात का सामना करने वाली महिलाओं पर ही आजमाया जाता है। इसके अलावा ये मिडिल क्लास व्यक्ति के पहुंच से परे हो जाता है। अगर किया जा रहा शोध जल्द ही सफल हो जाता है तो इस टेस्ट का खर्च मौजूदा तकनीक से दो-तिहाई कम होगा। इससे संतान सुख के लिए आईवीएफ का सहारा लेने वाले लगभग सभी जोड़ों को टेस्ट की पेशकश करने की राह खुलेगी।
आने वाले दिनों में इन विट्रो फर्टिलाइजेशन (आईवीएफ) ट्रीटमेंट सस्ता हो सकता है, अगर रिसर्च पूरी हो जाएगी और रिजल्ट मन के मुताबिक आए तो इलाज का खर्च 20 हजार रुपये तक हो सकता है। हालांकि यह तकनीक हर मरीज के लिए ठीक नहीं होगी। भारत में आईवीएफ का कारोबार अब बहुत तेजी से आगे बढ़ रहा है।
भारत में मेडिकल टूरिज्म बहुत तेजी से आगे बढ़ा है खास करके इनफर्टिलिटी के इलाज के लिए और पुरुष और महिलाओं के इलाज के लिए। इंदिरा आईवीएफ की निसंतानता और आईवीएफ एक्सपर्ट डॉ. प्रतिभा सिंह ने बताया की इनफर्टिलिटी के इलाज की बात करें तो पिछले कुछ साल में भारत में इसका बाजार बहुत ही तेजी से बढ़ा है। आर्टिफीसियल इनसेमिनेशन, आईवीएफ ,गमेस इंट्रा फैलोपियन ट्रांसफर, इंट्रासाइटोप्लास्मिक स्पर्म इंजेक्शन, सरोगेसी और डोनर एग ट्रीटमेंट आदि जैसे टेक्नोलॉजी के साथ भारत में इनका बाजार बहुत तेजी से फैल गया है।
अगर देखा जाए तो आईवीएफ की कीमत 10000 डॉलर होता है लेकिन भारत में 2000 से 3000 डॉलर में ही ये काम हो जाता है। भारत के कई शहरों में आईवीएफ ट्रीटमेंट का इलाज अब संभव है। अगर देखा जाए तो पश्चिमी देशों के मुकाबले भारत में आईवीएफ ट्रीटमेंट का खर्च बहुत कम है। एक ये भी कारण है की बहार से लोग यहां आकर अपना ट्रीटमेंट कराते हैं। इस वजह से भी यहां के आम लोगों के लिए ये ट्रीटमेंट थोड़ा महंगा हो जाता है।
भारत में आईवीएफ ट्रीटमेंट के एक सेशन का खर्च हर जगह अलग अलग हो सकता है। यह आईवीएफ सेंटर पर निर्भर करता है, जैसे महानगरों में आईवीएफ सेंटर का खर्च अलग होगा वही किसी कस्बे या गांव में इसकी लागत अलग होगी। इस ट्रीटमेंट का खर्च करीब एक लाख से दो लाख तक जा सकता है। डॉक्टरों की जानकारी के मुताबिक आईवीएफ में प्रमुख खर्च हॉस्पिटल, डॉक्टर और आईवीएफ प्रोसीजर में होता है। उसके अलावा मरीज का दवा एवं इंजेक्शन इन सभी चीज़ों में अधिक खर्च लग सकता है। मूल रूप से आईवीएफ ट्रीटमेंट का खर्च मरीज के इलाज एवं दवाई की जरूरतों पर भी निर्भर करता है। थोड़े बड़े लेवल के ट्रीटमेंट जैसे आईवीएफ ट्रीटमेंट या इंट्रासाइटोप्लास्मिक स्पर्म इंजेक्शन की कीमत ज्यादा हो सकता है। एक अच्छे ओवोसिट के लिए आईवीएफ ट्रीटमेंट का खर्च 2 लाख पार भी कर सकता है। आईवीएफ ट्रीटमेंट ने पिछले 10 वर्षों में काफी उन्नति की है, इस ट्रीटमेंट के कॉस्ट कम हुए है और सफलता दर काफी बढ़ी है।
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