महिला जिसने जीवन के सारे सुखों को जी लिया हो उसके बाद भी एक अहसास ऐसा होता है जिससे अगर वह महरूम रह जाये तो जीवन सूना सा लगता है, यह अनमोल अनुभव है मातृत्व। करियर की अंधी दौड, देरी से शादी, शारीरिक विकार या देरी से फैमिली प्लानिंग से महिलाओं का एक बड़ा वर्ग संतान प्राप्ति से दूर रहा जाता है। ज्यादातर महिलाओं में यह गलत फहमी होती है कि वे किसी भी उम्र में नेचुरली माँ बन सकती है। महिला की प्रजनन क्षमता से उम्र का बड़ा संबंध है। 35 वर्ष की उम्र के बाद महिला के प्राकृतिक गर्भधारण की संभावनाएं कम होती जाती है क्योंकि इस उम्र के बाद से अंडों की क्वालिटी और संख्या में कमी होने लगती है और अगर गर्भधारण हो भी जाये तो गर्भपात होने का डर रहता है। काफी प्रयासों के बाद भी गर्भधारण नहीं होना या गर्भपात हो जाने से महिला तनाव में रहने लगती है जिससे परिवार में दूरियां बढ़ने लगती हैं। वे महिलाएं जो उम्रदराज हैं और संतान चाहती हैं उनके नेचुरल प्रेगनेंसी की तुलना में आईवीएफ अधिक लाभदायक है।
आंकडों पर ध्यान दें तो 40 से 44 उम्र की महिलाओं की गर्भधारण की क्षमता काफी कम होकर 10 प्रतिशत से भी कम रह जाती है। इस उम्र तक महिला के माहवारी अनियमित या बंद हो जाती है जिसके बाद प्रेगनेंसी मुश्किल होती है। ऐसी स्थिति में महिला के लिए आईवीएफ ट्रीटमेंट के बारे में जानना और अपनाना बेहद जरूरी है क्योंकि यह एकमात्र उपाय है जो उसकी जिंदगी में खुशियों को जन्म दे सकता है।