आज से सौ साल से कुछ अधिक समय की बात है, एक आदमी नोबेल अकादमी के मंच पर खड़ा होता है। उसका सिर घूम रहा है, वह हवा में उड़ रहा है, क्योंकि उस पर नोबेल पुरस्कार की वर्षा हुई है। उसे 1920 का साहित्य का नोबेल पुरस्कार प्राप्त हुआ है। वह अपनी एवं अपने देश की ओर से स्वीडिश अकादमी का धन्यवाद करता है। उसने दूसरों से बहुत कुछ सीखा है और उसके लिखने की अपनी एक खास शैली है। मगर उसे अफसोस है, उसका यौवन जा चुका है। और वह दुनिया के युवाओं के लिए, जीवन में जो कुछ भी युवा है, उसके लिए प्रतिभोज के अवसर पर प्रपोज करता है।
क्नूत हाम्सुन को उनके उपन्यास ‘ग्रोथ ऑफ द सोयल’ हेतु उस साल का नोबेल पुरस्कार मिला था। ‘यह उनके स्थाई महत्व के महान कार्य ‘ग्रोथ ऑफ द सोयल’ हेतु दिया जाता है।’ ऐसा अकादमी ने अपनी प्रशंसा में कहा।
नॉर्वे में 4 अगस्त 1859 को जन्मे क्नूत का पूरा नाम क्नूत पेडरसन हाम्सुन है। जिंदगी भर उन्होंने नॉर्वेजियन भाषा में लिखा। पेट पालने के लिए उन्होंने मोची, राज मिस्त्री, शिक्षक आदि तरह-तरह के काम किए, पर सदा भयंकर गरीबी में रहे। लिखने का जुनून पागलपन की हद तक था, मगर लिखने केलिए कागज-कलम और सकून चाहिए, जिसके लिए सदा तरसना पड़ा।
जैसे वॉन गॉग बिना पेंट किए नहीं रह सकता था, वैसे ही हाम्सुन के लिए बिना लिखे जवित रहना कठिन था। 1890 में लिखे ‘सल्ट’ ( इंग्लिश में ‘हंगर’, हिन्दी में ‘भूख’) तथा ‘पान’ (1894) से उन्हें विश्व ख्याति मिली। स्वीडिश अकादमी के अनुसार, ‘सल्ट’ (‘हंगर’) नॉर्वे साहित्य में वास्तविक रूप में पहला आधुनिक उपन्यास माना जाता है।’
कालजयी उपन्यास ‘हंगर’ (‘भूख’)
आज बात करती हूं, उनके इसी कालजयी उपन्यास ‘हंगर’ (‘भूख’) की। हाम्सुन को नॉर्डिक का दॉस्तवस्की कहा जाता है। काफ्का, थॉमस मान से प्रभावित हाम्सुन के साहित्य को मनोवैज्ञानिक साहित्य का अग्रणी माना जाता है। ‘हंगर’ उपन्यास को बीसवीं सदी के साहित्यिक उद्घाटन, आधुनिक एवं मनोवैज्ञानिक साहित्य का एक उत्कृष्ट उदाहरण माना जाता है।
भूख पर कई लोगों ने कलम चलाई है, नोबेल पुरस्कृत गुंटर ग्रास ने भी ‘फ्लाउंडर’ नाम से एक किताब लिखी है, जो भूख पर विश्लेषण है। ‘भूख’ नाम से कई कहानिया मिलती हैं। मगर हाम्सुन भूख का विश्लेशण नहीं कर रहे हैं।
यहां उपन्यास का नायक भूख से गुजर रहा है। भूख जिससे आंतें सूख कर ऐंठ गई हैं। क्रोध, हताशा, खीज, विफलता, निराशा, गरीबी, बेरोजगारी और भूख का ऐसा चित्रण साहित्य में दुर्लभ है।
आप स्वयं अपने जीवन में भूख से गुजरे हैं अथवा नहीं, पर जब आप इस किताब से गुजरते हैं, तो भूख से लड़ते एक युवा आदमी से तादात्म अवश्य बैठा पाते हैं। एक आदमी कितने मोर्चों पर एक साथ संघर्ष कर सकता है, उसे कितने मोर्चों पर संघर्ष करना होता है, यह पढ़ कर द्रवित हुए बिना नहीं रह सकते हैं। इसे पूरा पढ़ पाना अपने आप में यातना की एक नदी से गुजरना है।
यह व्यक्ति गरीब, भूखा और बेरोजगार है, मगर उसमें आत्मसम्मान कूट-कूट कर भरा हुआ है। एक समय ऐसा आता है, जब उसे खाना मिलता है, मगर उसका आत्मसम्मान उस खाने को ग्रहण करने से इंकार कर देता है। स्वाभिमान के चलते, वह किसी से पैसे भी नहीं ले पाता है।
पढ़ते हुए कई बार लगता है, कहीं यह व्यक्ति पागल तो नहीं हो गया है। वैसे भूख एवं हताशा आदमी को पागल कर दे तो क्या आश्चर्य! मगर यह व्यक्ति पागल नहीं है। इस लेखन में कहीं आत्म दया भी नहीं है।