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Ebola: इस देश में इबोला का भयानक प्रकोप, 3 महीने में 2300 से ज्यादा मौतें; हर आधे घंट में जा रही एक जान

Sun, 23 Aug 2026 10:49 PM IST
अभिलाष श्रीवास्तव हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

डेमोक्रैटिक रिपब्लिक कांगो, इबोला महामारी से बुरी तरह जूझ रहा है। देश में इबोला वायरस से अब तक तीन महीने में 2,325 लोगों की मौत हो चुकी है। आंकड़ों के मुताबिक हर आधे घंटे में इससे एक व्यक्ति की जान जा रही है।
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इबोला का आतंक - फोटो : Amarujala.com/AI
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विस्तार
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डेमोक्रैटिक रिपब्लिक कांगो पिछले कुछ महीनों से इबोला महामारी का प्रकोप झेल रहा है। 15 मई 2026 को इबोला के मौजूदा प्रकोप की आधिकारिक तौर पर घोषणा की गई थी। हाल ही में जारी किए गए सरकारी आंकड़ों के मुताबिक कांगो में इबोला वायरस से अब तक करीब 5 हजार लोग संक्रमित हो चुके हैं और 2,325 लोगों की मौत हो चुकी है। कांगों के अलावा यूगांडा भी इससे प्रभावित देखा जा रहा है।

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संयुक्त राष्ट्र ने भी कांगो में इबोला के प्रसार पर चिंता जताई है। यूएन के मुताबिक, कांगों में इबोला रिकॉर्ड तेजी से फैल रहा है और हर 30 मिनट में एक इंसान की जान ले रहा है। कांगो इससे पहले 2018 से 2020 में भी इबोला की चपेट में रहा है, हालांकि इस बार का संक्रमण और प्रसार काफी खतरनाक स्तर का है। कांगों इस बार इबाला के 17वें प्रकोप की चपेट में है। 

स्वास्थ्य संगठन प्रभावित इलाकों में लोगों से लगातार सावधानी बरतते रहने की अपील कर रहे हैं। भारत सहित दुनिया के कई देशों ने कांगो को इबोला के इस प्रकोप से बचाने के लिए जरूरी सहायता भी उपलब्ध कराई है। हालांकि कई संगठनों ने चिंता जताई है कि स्थानीय लोगों का पर्याप्त रूप से सहयोग न मिल पाना इस समय सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है। जांच में देरी और पर्याप्त इलाज की व्यवस्था न हो पाने के कारण लोगों के लिए ये संक्रामक बीमारी बड़ी मुसीबतों का कारण बनती जा रही है।

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इबोला का खतरनाक प्रकोप - फोटो : Amarujala.com/AI
पहली बार इबोला का देखा जा रहा है इतना खतरनाक प्रकोप

अंतरराष्ट्रीय मीडिया की रिपोर्ट के अनुसार कांगो के लिए इबोला कोई नई बात नहीं है, ये 17वां प्रकोप है। हालांकि इस बार मरने वालों की संख्या 2018 से 2020 के बीच आए पिछले बड़े प्रकोप से भी ज्यादा हो गई है। उस दौरान 3,481 मामले सामने आए थे और इनमें 2,299 लोगों की मौत हुई थी।

इस प्रकोप की सबसे चिंताजनक बात इसकी रफ्तार है। इबोला का कोई भी प्रकोप इतनी तेजी से लोगों को संक्रमित करने और जान लेने वाला नहीं रहा है।

 

डब्ल्यूएचओ का कहना है कि अगर संक्रमण इसी रफ्तार से बढ़ता रहा तो यह 2014-16 में पश्चिमी अफ्रीका में फैले इबोला प्रकोप को भी पीछे छोड़ सकता है। उस प्रकोप को इबोला के इतिहास का सबसे घातक प्रकोप माना जाता है, जिसमें 11,000 से ज्यादा लोगों की मौत हुई थी।

अन्य देशों में इबोला का खतरा

इबोला कांगो और यूगांडा तक ही सीमित नहीं है, ये दूसरे देशों की ओर भी बढ़ा है। 24 जून की रिपोर्ट में हमने जानकारी दी थी कि  फ्रांस में इबोला का पहला मामला सामने आया है। कांगो में एक मानवीय मिशन से लौटे डॉक्टर के इस जानलेवा वायरस से संक्रमित होने की पुष्टि हुई थी। 

भारत में भी इबोला के संदिग्ध मामले सामने आते रहे हैं हालांकि केस की पुष्टि नहीं हुई है। 

इबोला का खतरा - फोटो : आईएएनएस
सिर्फ वायरस ही नहीं, कई जमीनी स्थितियां भी बढ़ा रही हैं खतरा

इस बार कांगो में इबोला का जो वायरस फैल रहा है, वह बुंडिबुग्यो वायरस है। इसके खिलाफ अभी तक कोई ऐसी वैक्सीन या इलाज स्वीकृत नहीं है, जिसे नियमित रूप से इस्तेमाल के लिए मंजूरी मिल चुकी हो। हालांकि, कांगों के इटुरी प्रांत में इस वायरस की वैक्सीन और इलाज को लेकर क्लिनिकल ट्रायल चल रहे हैं।


इबोला से निपटने वाली मेडिकल टीमों के सामने भी कई बड़ी परेशानियां हैं। 
  • कुछ स्वास्थ्यकर्मी वेतन न मिलने के कारण हड़ताल पर हैं। विद्रोही समूहों की ओर से खतरे हैं। 
  • लंबे समय से परेशान स्थानीय लोगों में स्वास्थ्य व्यवस्था और अधिकारियों को लेकर गुस्सा भी है। 
  • कई इलाकों तक पहुंचने वाली सड़कें खराब हैं, जिससे मरीजों और प्रभावित क्षेत्रों तक पहुंचना कठिन हो रहा है। 
  • इसके अलावा सोशल मीडिया और स्थानीय स्तर पर फैली गलत जानकारी भी समस्या बढ़ा रही है। 
  • कुछ जगहों पर लोग यह तक मानने को तैयार नहीं हैं कि इबोला वास्तव में कोई बीमारी है।
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इबोला के खतरे को कम करने के लिए वैक्सीन - फोटो : Adobe Stock
13 अगस्त को संयुक्त राष्ट्र के मानवीय सहायता प्रमुख टॉम फ्लेचर ने बताया कि इबोला से निपटने के लिए 3.05 करोड़ डॉलर की अतिरिक्त सहायता दी जा रही है। इसके साथ ही मोर्चे पर काम करने के लिए 20 और कर्मचारियों को भेजा जाएगा। फ्लेचर ने इसे 'खतरे की घंटी' बताते हुए कहा कि वायरस को और ज्यादा आगे बढ़ने से रोकने के लिए तेजी से, बड़े स्तर पर और मिलकर काम करने की जरूरत है। हालांकि जमीनी हालात कुछ और बयां कर रहे हैं। 

वैक्सीन तो है, पर कितनी असरदार ये पता नहीं

डब्ल्यूएचओ ने बताया कि कांगो को एर्वेबो वैक्सीन की 70 हजार खुराकें मिलने जा रही हैं। यह वही वैक्सीन है, जो इबोला के पिछले प्रकोपों के दौरान प्रभावी साबित हो चुकी है।
 
  • ये खुराकें दुनियाभर में सुरक्षित रखे गए इबोला वैक्सीन के वैश्विक भंडार से दी जा रही हैं। 
  • इन 70 हजार में से 20 हजार डोज का इस्तेमाल एक बड़े और अंतिम चरण के क्लिनिकल ट्रायल में किया जाएगा। जिससे पता किया जा सके कि ये वैक्सीन बुंडिबुग्यो वायरस के खिलाफ कितनी सुरक्षा दे सकती है?
  • यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है। एर्वेबो वैक्सीन को इबोला के खिलाफ इस्तेमाल करने की मंजूरी पहले ही मिली हुई है। हालांकि बुंडिबुग्यो वायरस के खिलाफ इस्तेमाल के लिए अभी तक इसे मंजूरी नहीं दी गई है। 
  • डब्ल्यूएचओ का कहना है कि अभी यह पता नहीं है कि इंसानों में ये वैक्सीन बुंडिबुग्यो वायरस से सुरक्षा दे सकती है या नहीं? इसी कारण इस समय होने वाला क्लिनिकल ट्रायल बेहद महत्वपूर्ण है। 


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स्रोत
Ebola disease


अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।
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