छिंदवाड़ा प्रकरण से पूरे देश का चिकित्सा जगत हिला हुआ है, बेचैन है। शायद असहाय भी।
बाजार और सरकारी तंत्र से मरीजों को बचाने की लड़ाई एक ईमानदार चिकित्सक अक्सर लड़ता रहता है, किंतु अब तो बाजार से दवाई लेकर खाना भी इतना खतरनाक हो चुका है कि हमारी समझ से बाहर है, इसमें डॉक्टरों कोई दोष नहीं है। दवा निर्माताओं और बड़े अधिकारियों का अमानवीय गठजोड़ सिर्फ पैसा चाहता है। मंत्रालय में बैठे बड़े अधिकारियों को जनता को अच्छी चिकित्सा सेवा मुहैया कराने में कोई रुचि नही हैं।
इस तरह का दावा करते हुए ईएसआई पद पर रह चुके एक वरिष्ठ अधिकारी बताते हैं, ''मुझे मालूम है कैसे भोपाल से बड़े अधिकारी केवल फोन कर देते थे (कभी कोई लिखित आदेश नहीं भेजते) कि इस प्रकार की दवा खरीदा करें। उनकी रुचि थी की किसी एक/दो कंपनी की यही दवाई के ऑर्डर जारी करें, जबकि हमें मालूम रहता था की फलां दवाई अमानक है।''
वरिष्ठ अधिकारी बताते हैं-
स्टाफ के मेडिकल परीक्षण करने के बाद खुद मरीज हाथ जोड़कर कहता था कि साहब ईएसआई की दवाई नहीं लिखना, बाहर की दवाई लिखो, पर चिकित्सकों को अधिकारियों के आदेश का पालन करना ही पड़ता है नहीं तो कहीं के कहीं फेंक देंगे, यह धौंस सामान्य थी।
वे कहते हैं, यह बात करीब 12-15 वर्ष पूर्व की है। अब तो हालात और बिगड़ चुके हैं। अब तो सीधे-सीधे आईएएस अधिकारी 30% पैसा मांग रहे हैं, गलत दवा खरीदी करवा रहें है। 'आयुष्मान योजना' तो जैसे भ्रष्टाचार के लिए ही बनी है। अस्पतालों को पैसे नही मिल रहें हैं क्योंकि अफसर बड़ी-बड़ी रिश्वत मांगते हैं जो वे दे ही नहीं सकते। पूरा सिस्टम बुरी तरह सड़ चुका है।
भगवान भी क्या कर सकेंगे इस भ्रष्ट व्यवस्था में?