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कोरोना से जंग: एकांत का रौशन गान, एक दीया देश के नाम

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हमारी संस्कृति में बिना दीया जलाए कोई भी पर्व या अनुष्ठान पूर्ण नहीं होता है - फोटो : File
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आज पूरा विश्व कोरोना महामारी के कारण दुख विषाद चिंता और अवसाद के अंधेरे में घिर चुका है, उस वक्त हमारे प्रधानमंत्री के द्वारा सामूहिक शक्ति और उत्साह का प्रतीक के रूप में दीया, मोमबत्ती, टॉर्च या मोबाइल की फ्लैश लाइट जलाने की बात स्वागत योग्य है। आज यह वायरस मानव के अस्तित्व के लिए खतरा बनता जा रहा है, तो वहीं देश में पिछले कई दिनों से लॉकडाउन के कारण घर में ही लॉक हो चुकी जनता का भी संयम धीरे-धीरे इस लड़ाई के मुख्य हथियार सोशल डिस्टेंसिंग और लॉकडाउन का पालन करते करते कम होने लगा है। 

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इस लड़ाई में जनता का उत्साह फीका पड़ने लगा है जोकि सही नहीं है। अभी हमने पूरी जंग जीती नहीं है। हम जंग जीतने की ओर बढ़ चले थे पर चंद लोगों ने पूरा खेल बिगाड़ कर रख दिया। इस कारण देश में गुस्सा भी है और मानव स्वभाव के अनुसार इतने लंबे समय तक लॉकडाउन के कारण उसका उत्साह कम होना स्वभाविक है। इसके कारण 5 अप्रैल को रात नौ बजे नौ मिनट के लिए सभी लाइट बंद कर हम अपने सामूहिक शक्ति का प्रदर्शन करते हुए  एक दीया जलाकर इस कोरोना महामारी के कारण पूरे देश में फैले दुख और निराशा के अंधकार को मिटाएंगे।

आज जब पूरी दुनिया इससे निपटने के लिए हर संभव प्रयास कर रही है, भारत ने भी कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी है। उस वक्त दीया नहीं जलाएंगे... जैसे अनर्गल प्रलाप सिर्फ मोदी विरोध के कारण हो रहे हैं। विरोध करने वालों में मशहूर शायर मुनव्वर भी शामिल है। खासकर पढ़े-लिखे मुसलमानों से ऐसी उम्मीद न थी, जो अपनी कौम के जमात पर एक शब्द ना बोल सके और इस सामूहिक प्रयास पर बोलने के लिए चल पड़े। हद है विरोध करने की। खासकर उस वक्त जब देश संकटों से गिरा है, जब सकारात्मक सोच और सकारात्मक वातावरण होना आवश्यक है।
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हमारी संस्कृति में बिना दीया जलाए कोई भी पर्व या अनुष्ठान पूर्ण नहीं होता है। दीया जलाने के पीछे वैज्ञानिक आधार भी है। बृहदारण्यक उपनिषद श्लोक जो पूरे भारत में प्रसिद्ध है- "ओम असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय, ओम शांति शांति शांति" इस प्रसिद्ध श्लोक का अर्थ है कि मुझे असत्य से सत्य की ओर ले चलो, मुझे अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो। वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए तो दीपक जलाने से सरसों में उपस्थित विशिष्ट रसायनों का ऑक्सीकरण होने से घर में सकारात्मक ऊर्जा में वृद्धि होती है। वातावरण से सूक्ष्म कीटाणुओं का नाश होता है। यही कारण है कि प्राचीन समय में जब कोई अतिथि आते थे तो गृह प्रवेश के वक्त उनकी आरती उतारने का विधान था। ताकि दूरदराज से आए व्यक्ति के साथ आने वाले सूक्ष्म कीटाणु नष्ट हों और नकारात्मकता सकारात्मक तरंगों में बदल जाए।

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उत्साह के साथ एक दिया जलाएं और नकारात्मकता को दूर भगाएं - फोटो : File
आज जब कोरोना से संक्रमित होने वाले लोगों की संख्या पूरे विश्व में दस लाख पार कर चुकी है, बड़े देश और बड़े शहरों में मौत का तांडव चल रहा है, दुनियाभर और निराशा के माहौल में जीने को विवश हो चुकी है, तो ऐसे समय में हमें इस नकारात्मकता पर प्रबल विजय के लिए हम सब को सकारात्मक रूप से सफल होकर इसे मात देनी होगी। प्रधानमंत्री मोदी ने अपने वीडियो संदेश में स्पष्ट किया कि हमें खुद को अकेला नहीं समझना है। इस जंग में हर भारतीय का योगदान महत्वपूर्ण है, जो लॉकडाउन का पालन कर रहा है। प्रधानमंत्री ने इस महामारी को रोकने के लिए इससे पूर्व 19 मार्च को संयम और संकल्प लेने का आह्वान किया था, तो वहीं 22 मार्च को जनता कर्फ्यू की घोषणा हुई। 

कोरोना वायरस से निपटने के लिए देशव्यापी लॉकडाउन की घोषणा जैसे ठोस उपायों के कारण ही हम काफी हद तक सुरक्षित हैं और देश में इसका संक्रमण स्टेज-2 में ही हैं। अन्यथा कई बड़े देश, जिन्होंने इस वायरस को छोटा और कमजोर समझा, आज इसके सामने घुटने टेकने की स्थिति में आ चुके हैं। तो आइए हम सभी पूरे उत्साह के साथ संकल्प, संयम, सकारात्मकता, सम्मान और सहयोग को मूल मंत्र बनाकर इस कोरोना रूपी अंधकार को दूर करने के लिए एक सकारात्मक दीप जलाएं और वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा फैलाएं। इस उत्साह के आवेग में आकर हम लॉकडाउन की लक्ष्मणरेखा बिना पार किए ही पूरे जोश और उत्साह के साथ एक दिया जलाएं और नकारात्मकता को दूर भगाएं।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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