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चिंता: लाइफस्टाइल-डाइट सबकुछ ठीक फिर भी हो रही डायबिटीज, 2050 तक 30% बढ़ सकते हैं मामले; आखिर क्या है वजह?

Tue, 01 Sep 2026 01:49 PM IST
अभिलाष श्रीवास्तव हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

दुनिया के कई देशों में टाइप-1 डायबिटीज के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं और अकेले ब्रिटेन में 2050 तक मरीजों की संख्या 4.20 लाख से अधिक होने का अनुमान है। यह बीमारी मोटापे या खराब खान-पान के कारण नहीं, बल्कि ऑटोइम्यून प्रक्रिया से होती है। बच्चों में इसका खतरा सबसे ज्यादा देखा जाता रहा है।
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टाइप-1 डायबिटीज को लेकर चिंता - फोटो : Amarujala.com/AI
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विस्तार
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डायबिटीज का नाम सुनते ही सबसे पहले हमारे दिमाग में मोटापा, मीठा खाने, एक्सरसाइज की कमी और खराब लाइफस्टाइल जैसी बातें आने लगती हैं। पर हर बार डायबिटीज के लिए यही चीजें जिम्मेदार हों, ऐसा जरूरी नहीं है। स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, कई बार हमारी दिनचर्या तो ठीक होती है पर शरीर खुद कुछ ऐसी गड़बड़ी कर देता है जो आपको शुगर का मरीज बना सकती है। टाइप-1 डायबिटीज ऐसी ही एक गंभीर समस्या है जिसको लेकर स्वास्थ्य विशेषज्ञ काफी चिंतित रहे हैं।

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मेडिकल रिपोर्ट्स से पता चलता है कि टाइप-1 डायबिटीज कोई ऐसी बीमारी नहीं है जिसे सिर्फ ज्यादा मिठाई खाने या वजन बढ़ने से जोड़कर देखा जाए। यह एक ऑटोइम्यून बीमारी है, जिसमें शरीर का इम्यून सिस्टम गलती से इंसुलिन बनाने वाली कोशिकाओं को ही नुकसान पहुंचाने लगता है। नतीजा यह होता है कि शरीर में इंसुलिन बहुत कम या बिल्कुल नहीं बनता और ब्लड में शुगर लगातार हाई रहने लगता है। इसे कंट्रोल करने के लिए मरीजों को अक्सर जीवनभर के लिए इंसुलिन इंजेक्शन लेते रहने की जरूरत हो सकती है।

हालिया रिपोर्ट्स में वैज्ञानिक चिंता जता रहे हैं कि आने वाले दशकों में इस डायबिटीज के मामलों में और तेजी से बढ़ोतरी हो सकती है। यूके के विशेषज्ञों ने चिंता जताई है कि ब्रिटेन में टाइप-1 डायबिटीज के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं साल 2050 तक यहां मरीजों की संख्या करीब एक-तिहाई बढ़ सकती है। इस चेतावनी को सिर्फ ब्रिटेन ही नहीं पूरी दुनिया के संदर्भ में चिताजनक माना जा रहा है। पर सवाल ये है कि आखिर टाइप-1 डायबिटीज के मामलों के बढ़ने के पीछे कारण कौन से हो सकते हैं?

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डायबिटीज के बढ़ते जोखिमों को लेकर अध्ययन - फोटो : Adobe stock
टाइप-1 डायबिटीज को लेकर चिंता

ब्रिटेन की स्थानीय मीडिया की रिपोर्ट्स के मुताबिक वहां टाइप-1 डायबिटीज के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक साल 2000 के दशक की शुरुआत से ही टाइप-1 डायबिटीज के मामले करीब 25 प्रतिशत बढ़ चुके हैं।

वैज्ञानिक फिलहाल ये तो नहीं समझ पाए हैं कि टाइप-1 डायबिटीज के मामले इतनी तेजी से क्यों बढ़ रहे हैं? हालांकि कुछ शोधकर्ताओं का मानना है कि इसके पीछे कई पर्यावरणीय कारण जिम्मेदार हो सकते हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, ये सिर्फ ब्रिटेन ही नहीं पूरी दुनिया के लिए अलार्म हो सकता है, सभी देशों को इस खतरे को लेकर अलर्ट रहने की आवश्यकता है।

कुछ अध्ययनों में विशेषज्ञों ने बताया है कि बचपन में होने वाले कुछ वायरल संक्रमण, वायु प्रदूषण और फॉरएवर केमिकल्स यानी ऐसे रसायन जो पर्यावरण और शरीर में लंबे समय तक बने रहते हैं, उनसे खतरा बढ़ सकता है।

कम उम्र में टाइप-1 डायबिटीज के मामले - फोटो : Freepik.com
क्या हो सकती है बढ़ते मामलों की वजह?

किंग्स कॉलेज लंदन की विशेषज्ञ डॉ. रोसिएरेड ब्राउनसन-स्मिथ कहती हैं, टाइप-1 डायबिटीज में हो रही यह बढ़ोतरी इतनी तेज है कि इसे केवल हमारे जीन में बदलाव से नहीं समझा जा सकता। 
 
  • पर्यावरण में हो रहे बदलाव और जीवन के शुरुआती वर्षों में शरीर के संपर्क में आने वाली अलग-अलग चीजें, उन लोगों में बीमारी का खतरा बढ़ा सकती हैं जिनमें पहले से आनुवंशिक संवेदनशीलता ज्यादा है।
  • वैज्ञानिक दुनियाभर में बढ़ रहे टाइप-1 डायबिटीज के लिए कई अन्य संभावित कारणों पर भी विचार कर रहे हैं। बचपन का मोटापा, वायरल संक्रमण, गट माइक्रोबायोम, बचपन में सूक्ष्मजीवों के संपर्क में आना, वायु प्रदूषण और कुछ खास रसायनों के संपर्क को लेकर भी जांच की जा रही है।  

विशेषज्ञों का मानना है कि इसके पीछे किसी एक पर्यावरणीय कारण को जिम्मेदार नहीं माना जा सकता। कई अलग-अलग कारक एक साथ मिलकर आनुवंशिक रूप से संवेदनशील लोगों पर अटैक कर सकते हैं। कुछ अध्ययनों में यह भी संकेत मिला है कि वायु प्रदूषण ऑटोइम्यून बीमारियों का खतरा बढ़ाने वाला हो सकता है। 

टाइप-1 डायबिटीज को लेकर टेंशन - फोटो : Freepik.com
दुनियाभर में टाइप-1 डायबिटीज को लेकर चिंता

यूरोपियन एसोसिएशन फॉर द स्टडी ऑफ डायबिटीज की वार्षिक बैठक में इस रिपोर्ट को प्रस्तुत किया जाना है। अनुमान के मुताबिक, दुनियाभर में हर साल टाइप-1 डायबिटीज के सामने आने वाले नए मामलों की संख्या करीब 14 प्रतिशत बढ़ सकती है। 

डेनमार्क के यूनिवर्सिटी हॉस्पिटल ऑफ सदर्न के विशेषज्ञों के मुताबिक, टाइप-1 डायबिटीज के बढ़ते मामलों की एक बड़ी वजह यह भी है कि अब लोगों में इस बीमारी की निदान भी तेजी से हो रहा है, मामले ज्यादा रिपोर्ट किए जा रहे हैं। 
 
  • टाइप-1 डायबिटीज से शरीर में कई गंभीर जटिलताएं हो सकती हैं। इससे किडनी की बीमारी, स्ट्रोक, आंखों की रोशनी जाने और नसों को नुकसान पहुंचने तक का खतरा हो सकता है।
  • पुराने अध्ययनों में कहा जाता रहा था कि टाइप-1 डायबिटीज वाले लोग स्वस्थ लोगों की तुलना में औसतन 15 से 20 साल कम जीते हैं। लेकिन हाल के अध्ययनों में यह अंतर करीब 11 साल बताया गया है।
  • इससे पता चलता है कि पिछले कुछ दशकों में इलाज और देखभाल बेहतर होने से मरीजों की जीवन प्रत्याशा में सुधार हुआ है।

डॉ. ब्राउनसन-स्मिथ कहते हैं, जिन लोगों को कम उम्र में टाइप-1 डायबिटीज का पता चलता है, वे अगर इंसुलिन, ग्लूकोज मॉनिटरिंग और डायबिटीज की नियमित देखभाल कर लें तो इसके खतरे को कम किया जा सकता है।

टाइप-1 डायबिटीज के इलाज में रोजाना इंसुलिन लेना जरूरी होता है। हालांकि वैज्ञानिकों ने हालिया शोध में कई कारगर वीकली इंसुलिन शॉट के बारे में जानकारी दी है, जिसमें मरीजों को रोज-रोज नहीं बल्कि हफ्ते में बस एक दिन इंजेक्शन लेने की जरूरत होती है।
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डायबिटीज और इसके खतरे - फोटो : Adobe Stock
गरीब देशों में खतरा ज्यादा

विशेषज्ञ कहते हैं, टाइप-1 डायबिटीज के मरीजों की संख्या बढ़ने का असर खास तौर पर गरीब देशों में ज्यादा गंभीर हो सकता है, क्योंकि वहां इंसुलिन और दूसरे जरूरी इलाज तक पहुंच सीमित है।

शोध टीम ने नीति निर्माताओं से अपील की है कि वे बढ़ती मरीजों की संख्या को देखते हुए यह सुनिश्चित करें कि सभी मरीजों को जरूरी इलाज मिल सके। मरीजों की संख्या बढ़ने के साथ डायबिटीज से जुड़ी स्वास्थ्य सेवाओं पर भी दबाव बढ़ेगा।
 
  • टाइप-1 डायबिटीज के लक्षण आमतौर पर तेजी से सामने आते हैं। टाइप-2 डायबिटीज की ही तरह इसमें भी  बहुत ज्यादा प्यास लगने, बार-बार पेशाब आने और बिना किसी स्पष्ट कारण के वजन कम होने की दिक्कत हो सकती है। कुछ लोगों को थकान, धुंधला दिखाई देने, घाव के देर से ठीक होना जैसे कई लक्षण दिखाई दे सकते हैं।

विशेषज्ञों ने कहा है कि अगर आपको बच्चे में इस तरह की दिक्कत लगातार बनी रहती है तो समय रहते डॉक्टर से सलाह जरूर ले लें। बच्चों में  टाइप-1 डायबिटीज का निदान सबसे ज्यादा किया जाता रहा है।




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स्रोत:
The Management of Type 1 Diabetes in Adults. A Consensus Report by the American Diabetes Association (ADA) and the European Association for the Study of Diabetes (EASD)


अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।
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