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CJP Protest: सीजेपी की इस मांग पर मनोचिकित्सक की जरूरी सलाह, अनजाने में भी न हो आत्महत्या का महिमामंडन

Mon, 27 Jul 2026 09:53 PM IST
अभिलाष श्रीवास्तव हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

नीट अभ्यर्थियों की आत्महत्याओं के संदर्भ में वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ. सत्यकांत त्रिवेदी ने कॉकरोच जनता पार्टी के नाम एक खुला पत्र जारी करते हुए अपील की है कि पीड़ित परिवारों के लिए न्याय और मुआवज़े की मांग करते समय ऐसी भाषा का प्रयोग न किया जाए, जिससे अनजाने में आत्महत्या का महिमामंडन होने का संदेश जाए।
 
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सीजेपी की मांग और मेंटल हेल्थ का लिंक - फोटो : Amarujala.com/AI
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विस्तार
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देश में शिक्षा सुधारों और नीट पेपर लीक मामले को लेकर बीते दिनों दिल्ली के जंतर-मंतर पर जेन-जी का प्रदर्शन भारत ही नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय मीडिया में भी चर्चा का विषय बना रहा। करीब 36 दिनों तक चले इस प्रदर्शन के समर्थन में देश के अलग-अलग हिस्सों से युवा शामिल हुए। 

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20 जुलाई को मुद्दे ने तब और तूल पकड़ लिया, जब प्रदर्शनकारियों ने संसद की ओर कूच किया। इसके बाद विरोध और आक्रमक हो गया, हालांकि बाद में कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) की मांगों को सरकार ने स्वीकार किया और पेपर लीक और शिक्षा में सुधार को लेकर कड़े कानून बनाने का आश्वासन दिया।

इस पूरे प्रदर्शन के दो विषयों को लेकर इन दिनों खूब चर्चा हो रही है। पहला- प्रदर्शनकारियों की सरकार से तीन मांग और दूसरा प्रदर्शन में शामिल जेन-जी की भाषा। 

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छात्रों का विरोध प्रदर्शन - फोटो : पीटीआई
जंतर-मंतर पर प्रदर्शन

जंतर-मंतर के इस प्रदर्शन ने दो अलग-अलग लेकिन महत्वपूर्ण बहसों को जन्म दिया। 
 
  • समाजशास्त्रियों का कहना है, लोकतंत्र में विरोध दर्ज कराना नागरिकों का अधिकार है, सार्वजनिक संदेशों का असर लाखों लोगों तक पहुंचता है। ऐसे में प्रदर्शन के दौरान भी मर्यादा और भाषा के संयम का ध्यान रखना जरूरी है। शब्दों का चुनाव केवल अभिव्यक्ति का सवाल नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी का भी विषय बन जाता है।
 
  • वहीं दूसरी ओर मनोवैज्ञानिकों ने अपील की है कि नीट पेपरलीक से आहत जान गंवाने वाले छात्रों के परिवारों के लिए न्याय और मुआवजे की मांग करते समय ऐसी भाषा का प्रयोग न किया जाए, जिससे अनजाने में भी आत्महत्या के महिमामंडन का संदेश जाए।

अपनी मांग के साथ सीजेपी के प्रवक्ता - फोटो : अमर उजाला
पहले मानसिक स्वास्थ्य के गंभीर मुद्दे की बात कर लेते हैं।

बढ़ते प्रदर्शन को देखते हुए शिक्षामंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने शनिवार (25 जुलाई) को इस्तीफा दे दिया।  बाद में सरकार के साथ प्रदर्शनकारियों के प्रवक्ता ने एक प्रेस कांफ्रेंस के दौरान बताया कि सरकार ने उनकी तीनों मांगें मान ली हैं।


1. आंदोलनकारियों और विपक्षी दलों की पहली और सबसे बड़ी मांग केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की थी, जिसे लेकर बाद में नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए उन्होंने अपना इस्तीफा भी सौंप दिया।
2. दूसरी मांग आंदोलन के दौरान छात्रों और प्रदर्शनकारियों पर की गई एफआईआर और कानूनी मामलों को पूरी तरह से वापस लेने की मांग शामिल थी।
3. और तीसरी मांग परीक्षा में गड़बड़ी और पेपर लीक की घटनाओं से आहत होकर आत्महत्या करने वाले छात्रों के पीड़ित परिवारों के लिए 1 करोड़ रुपये के मुआवजे की मांग की गई थी।


प्रदर्शनकारियों की तीसरी मांग को लेकर वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ. सत्यकांत त्रिवेदी ने कहा, ये मांग तो जायज है लेकिन इसपर बात करते समय संवेदनशीलता जरूरी है।

 
डॉ सत्यकांत कहते हैं, पीड़ित परिवारों के लिए न्याय और मुआवजे की मांग करते समय ऐसी भाषा का प्रयोग न किया जाए, जिससे अनजाने में आत्महत्या का महिमामंडन होने का संदेश जाए। सार्वजनिक मंचों से दिए गए संदेश मानसिक संकट से गुजर रहे संवेदनशील युवाओं पर गहरा मनोवैज्ञानिक प्रभाव डाल सकते हैं। उनके अनुसार, यदि यह धारणा बने कि आत्महत्या के बाद परिवार को आर्थिक लाभ या विशेष सामाजिक ध्यान मिलेगा, तो कुछ संवेदनशील युवाओं द्वारा इसका गलत अर्थ निकाला जा सकता है। पीड़ित परिवारों के प्रति संवेदना व्यक्त करना और निष्पक्ष जांच व न्याय की मांग करना पूरी तरह उचित है, लेकिन इसके साथ यह संदेश भी समान रूप से प्रमुखता से दिया जाना चाहिए कि "आत्महत्या किसी भी समस्या का समाधान नहीं है।"


डॉ. त्रिवेदी ने सुझाव दिया है कि आंदोलन के साथ-साथ विद्यार्थियों तक मानसिक स्वास्थ्य सहायता पहुंचाने, परीक्षा व्यवस्था को अधिक पारदर्शी एवं निष्पक्ष बनाने तथा भविष्य में ऐसी घटनाओं की रोकथाम के लिए ठोस कदम उठाने पर भी समान जोर दिया जाए।

न्याय की मांग और आत्महत्या की रोकथाम दोनों साथ-साथ चलें, यही समाज और युवाओं के हित में होगा। सोशल मीडिया पर भी इस मुद्दे को लेकर बात करते समय लोगों को सावधानी बरतनी चाहिए।
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जंतर मंतर पर प्रोटेस्ट के दौरान प्रदर्शनकारी - फोटो : PTI
आंदोलन की भाषा को लेकर सवाल

इस प्रदर्शन को लेकर दूसरा मुद्दा आंदोलनकारियों द्वारा प्रयोग में लाई गई भाषा की है।

कॉलमिस्ट  विनोद पाठक कहते हैं, जेन जी ने जिस भाषा का प्रयोग अपना विरोध प्रकट करने के लिए किया और जिस तरह से अभद्रता वाले वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहे हैं, वह संस्कारी भाषा के पैरोकारों को गहरी चोट पहुंचाने वाला है। सवाल पूछा जा रहा है कि क्या यही युवा पीढ़ी है, जिसे देश को आगे ले जाना है, क्या वह इसी भाषा, अभिव्यक्ति, तेवर, वेशभूषा और संस्कारों के साथ आगे जाएगी? 

विनोद पाठक कहते हैं, विरोध, प्रदर्शन और नारे लोकतंत्र की स्वाभाविक अभिव्यक्तियां हैं, लेकिन इन सबके बीच संवाद की मर्यादा और भाषा का संयम भी उतना ही आवश्यक है। सोशल मीडिया पर प्रसारित वीडियो में जिस प्रकार की अभद्र, अश्लील और आक्रामक भाषा सुनाई दी, उसने केवल एक आंदोलन की शैली पर ही नहीं, अपितु हमारे सार्वजनिक विमर्श की गुणवत्ता पर गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं।

किसी भी घटना का मूल्यांकन कुछ वीडियो के आधार पर पूरे समाज पर आरोप लगाकर नहीं किया जा सकता, फिर भी यह स्वीकार करना होगा कि सार्वजनिक जीवन में भाषा का स्तर लगातार गिर रहा है। चिंता केवल इस बात की नहीं है कि गालियां दी गईं, बल्कि इस बात की है कि उन्हें विरोध की वैध भाषा के रूप में प्रस्तुत किया जाने लगा है।

विरोध तब अधिक प्रभावी होता है, जब वह तथ्यों, तर्कों और नैतिक बल पर आधारित हो। यदि संवाद का स्थान अपमान, गाली और व्यक्तिगत आक्षेप ले लें, तो अंततः लोकतांत्रिक संस्कृति ही कमजोर होती है। इस समस्या का समाधान केवल कानूनों से नहीं निकलेगा।


विरोध की भाषा भी लोकतांत्रिक होनी चाहिए।
 
इस मुद्दे को लेकर मनोचिकित्सक डॉ सत्यकांत त्रिवेदी कहते हैं, यदि किसी आंदोलन में कुछ प्रतिभागी चाहे वे पुरुष हों या महिलाएं संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों के लिए अश्लील गालियों का प्रयोग करते हैं, तो यह केवल राजनीतिक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि भीड़ के मनोविज्ञान का भी विषय है।

भीड़ में व्यक्ति अक्सर अपनी व्यक्तिगत जिम्मेदारी कम महसूस करता है। तीव्र क्रोध, समूह की स्वीकृति पाने की इच्छा, सोशल मीडिया पर ध्यान आकर्षित करने की प्रवृत्ति और भावनात्मक आवेग, भाषा को अधिक आक्रामक बना सकते हैं। ऐसे माहौल में लोग वह भी बोल जाते हैं, जिसे वे सामान्य परिस्थितियों में शायद कभी न कहें। यह व्यवहार किसी एक लिंग का गुण नहीं है। यदि लड़कियां भी अश्लील भाषा का प्रयोग करती हैं, तो उसके पीछे वही मनोवैज्ञानिक प्रक्रियाएं काम करती हैं जो पुरुषों में होती हैं,भावनात्मक उफान, समूह का प्रभाव, आवेग नियंत्रण में कमी और विरोध को अधिक तीव्र दिखाने की कोशिश।

किसी भी आंदोलन की नैतिक शक्ति उसके तर्क, संयम और गरिमा से बढ़ती है, न कि अपमानजनक भाषा से। जब असहमति की जगह गालियां ले लेती हैं, तो संवाद कमजोर पड़ता है और मूल मुद्दा भी पीछे छूट सकता है।


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नोट: यह लेख मेडिकल रिपोर्टस के आधार पर तैयार किया गया है।

अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें। 
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