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जानना जरूरी: ब्रेस्ट कैंसर के इलाज के बाद भी नहीं होती जिंदगी आसान, ऑन्कोलॉजी फिजियोथेरेपी कैसे कर सकती है मदद

Fri, 02 Oct 2026 01:04 PM IST
अभिलाष श्रीवास्तव डॉ. श्रेयसी घाटकर, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

स्तन कैंसर का इलाज पूरा होने के बाद सामान्य जीवन में लौटना अक्सर मरीजों के लिए काफी कठिन होता है। सर्जरी, रेडिएशन या अन्य उपचारों के बाद दर्द, कमजोरी, कंधे की जकड़न और हाथ में सूजन जैसी परेशानियां हो सकती हैं। ऑन्कोलॉजी फिजियोथेरेपी शरीर की कार्यक्षमता और सक्रियता वापस पाने में मदद कर सकती है।
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स्तन कैंसर और इलाज के बाद थेरेपी - फोटो : Amarujala.com/AI
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विस्तार
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अक्टूबर आते ही देश-दुनिया में जगह-जगह गुलाबी (पिंक) रंग नजर आने लगता है। जागरूकता अभियान, रैलियां और सोशल मीडिया पर गुलाबी रिबन के जरिए लोगों को स्तन कैंसर के प्रति जागरूक किया जाता है। लेकिन क्या स्तन कैंसर की कहानी केवल बीमारी की पहचान और इलाज तक सीमित है? शायद नहीं।

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कैंसर का इलाज जीवन बचाता है, लेकिन इलाज के बाद उस जीवन को दोबारा सामान्य तरीकेसे जी पाना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
 

  • क्या महिला अपने बालों में फिर से कंघी कर पा रही है?
  • क्या वह अपने कपड़े खुद पहन पा रही है?
  • क्या वह अपने बच्चे को गोद में उठा पा रही है?
  • क्या वह बिना डर और दर्द के परिवार के किसी सदस्य को गले लगा पा रही है?

ये छोटी-छोटी बातें लग सकती हैं, लेकिन कैंसर से उबर रही महिला के लिए यही उसकी वापस लौटती जिंदगी की बड़ी निशानियां होती हैं। यहीं से ऑन्कोलॉजी फिजियोथेरेपी की भूमिका शुरू होती है।

ब्रेस्ट कैंसर के इलाज के बाद की जिंदगी - फोटो : Adobe stock photos
जयपुर की 54 वर्षीय सुनीता की कहानी ऐसी ही है। स्तन कैंसर की सर्जरी के बाद सुनीता को अपने बाएं हाथ को ऊपर उठाने में परेशानी होने लगी। कंधे में जकड़न थी और हाथ उपर उठाने  पर दर्द होता था।

एक समय ऐसा आया कि बालों में कंघी करना और कपड़े पहनना भी उनके लिए मुश्किल हो गया। सुनीता को डर लगने लगा कि शायद उनका हाथ अब पहले जैसा कभी नहीं हो पाएगा। ऑन्कोलॉजी फिजियोथेरेपी की मदद से उन्होंने अपनी क्षमता के अनुसार धीरे-धीरे व्यायाम शुरू किया। कंधे के हलचल करने की क्षमता बढ़ाने, शरीर को मजबूत करने और रोजमर्रा की गतिविधियों को सुरक्षित तरीके से करने पर काम किया गया।

शुरुआत आसान थी। हर दिन थोड़ी-थोड़ी  कोशिश की गई । धीरे-धीरे सुनीता अपना हाथ पहले से ज्यादा ऊपर उठाने लगीं। उन्होंने फिर खुद कपड़े पहनना शुरू किया और बालों में कंघी करना भी संभव होने लगा। कुछ समय बाद वह घर के छोटे-मोटे काम भी करने लगीं। लेकिन सुनीता के लिए सबसे खास पल वह था जब वह अपने पोते को फिर से बिना परेशानी के गोद में उठा पाईं। उनके लिए यह सिर्फ हाथ की मूवमेंट वापस आना नहीं था। यह उनकी जिंदगी का एक हिस्सा वापस आना था।

कैंसर के इलाज के बाद शरीर को भी चाहिए पुनर्वास

स्तन कैंसर का इलाज कई चरणों में हो सकता है। इसमें सर्जरी, कीमोथेरेपी, रेडिएशन और हार्मोनल थेरेपी जैसी प्रक्रियाएं शामिल हो सकती हैं। हर उपचार के अपने प्रभाव होते हैं और हर महिला का अनुभव अलग हो सकता है।

सर्जरी के बाद कंधे में जकड़न या हाथ की हालचाल करने की क्षमता कम होना, यह अकसर दिख  जाने वाली समस्याओं  में शामिल हो सकता है। ऑपरेशन के आसपास बने निशान और ऊतकों में होने वाले बदलाव भी शरीर की गति को प्रभावित कर सकते हैं।

कुछ महिलाओं में लिम्फेडेमा यानी हाथ में सूजन हो सकती है। वहीं कुछ महिलाओं में एक्सिलरी वेब सिंड्रोम की समस्या हो सकती है, जिसमें बगल के नीचे खिंचाव और दर्द वाली पट्टी जैसा महसूस हो सकता है। इन समस्याओं के कारण रोजमर्रा के काम प्रभावित हो सकते हैं। ऐसे में विशेषज्ञ ऑन्कोलॉजी फिजियोथेरेपी का उद्देश्य केवल व्यायाम कराना नहीं होता। मरीज की स्थिति को समझकर उसकी शारीरिक क्षमता के अनुसार सुरक्षित और व्यक्तिगत पुनर्वास योजना तैयार करना महत्वपूर्ण होता है।

फिजियोथेरेपी इलाज खत्म होने के बाद ही शुरू हो, यह जरूरी नहीं

एक आम धारणा है कि फिजियोथेरेपी की जरूरत कैंसर का इलाज पूरा होने के बाद होती है। लेकिन ऑन्कोलॉजी फिजियोथेरेपी की शुरुआत कई मामलों में कैंसर का निदान होने के बाद ही की जा सकती है।

सर्जरी से पहले की जाने वाली प्री-हैबिलिटेशन (Prehabilitation) मरीज को ऑपरेशन के लिए शारीरिक रूप से तैयार करने में मदद कर सकती है। सर्जरी के बाद फिजियोथेरेपी का उद्देश्य शरीर की गति, ताकत और रोजमर्रा की कार्यक्षमता को धीरे-धीरे वापस लाना होता है। इसका अर्थ यह नहीं कि हर मरीज को एक जैसा व्यायाम करना चाहिए। कैंसर के मरीज के लिए व्यायाम भी उसकी बीमारी, इलाज और शारीरिक स्थिति के अनुसार होना चाहिए।

मुंबई की आशा की कहानी

42 वर्षीय आशा मुंबई में रहती हैं। स्तन कैंसर के इलाज के दौरान उन्हें लगातार बहुत ज्यादा थकान महसूस होती थी। कुछ कदम चलने के बाद ही उन्हें बैठने का मन करता था।
उन्हें लगता था कि जितना ज्यादा आराम करेंगी, उतना ही शरीर ठीक होगा। लेकिन लगातार कम सक्रिय रहने से उनकी ताकत और कम होती जा रही थी।

ऑन्कोलॉजी फिजियोथेरेपी के दौरान उनकी क्षमता को ध्यान में रखते हुए एक आसान कार्यक्रम तैयार किया गया। आशा ने कठिन कसरत नहीं शुरू की।

उन्होंने छोटी-छोटी गतिविधियों से शुरुआत की। थोड़ी देर चलना, फिर आराम करना। काम को छोटे हिस्सों में बांटना। अपनी ऊर्जा को समझकर दिन की गतिविधियां तय करना। धीरे-धीरे उन्हें महसूस हुआ कि उनका शरीर पहले से ज्यादा सक्रिय रहने लगा है। कुछ समय बाद उन्होंने घर के अंदर ज्यादा आसानी से चलना शुरू किया और फिर परिवार के साथ छोटी सैर भी करने लगीं।

आशा के लिए सबसे बड़ा बदलाव यह था कि उन्होंने अपने शरीर पर फिर से भरोसा करना शुरू कर दिया। कैंसर के इलाज के बीच भी उन्हें महसूस हुआ कि उनकी जिंदगी केवल बीमारी और अस्पताल तक सीमित नहीं है। वह फिर से अपनी जिंदगी का हिस्सा बन सकती हैं।
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ऑन्कोलॉजी फिजियोथेरेपी कैसे करती है मदद? - फोटो : Adobe Stock Photo
कीमोथेरेपी के दौरान होने वाली थकान को न करें नजरअंदाज

कीमोथेरेपी या इम्यूनोथेरेपी के दौरान कई मरीजों को गहरी और लगातार थकान महसूस हो सकती है। इसे कैंसर रिलेटेड फैटिग कहा जाता है। यह सामान्य थकान से अलग हो सकती है और केवल आराम करने से हमेशा पूरी तरह दूर नहीं होती। ऐसे समय में मरीज की शारीरिक क्षमता के अनुसार सुरक्षित गतिविधियां और व्यायाम मददगार हो सकते हैं।
यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है।

कैंसर के दौरान व्यायाम का मतलब जिम में जाकर भारी वजन उठाना नहीं है। कई बार छोटे और सुरक्षित कदम ही बड़ी शुरुआत होते हैं। इसी तरह कुछ मरीजों में कीमोथेरेपी इंड्यूस्ड पेरीफेरल न्यूरोपैथी  हो सकती है, जिसमें हाथ-पैरों में झनझनाहट, सुन्नपन या जलन महसूस हो सकती है। इससे चलने और संतुलन बनाने में परेशानी हो सकती है। ऐसी स्थिति में ऑन्कोलॉजी फिजियोथेरेपी विशेषज्ञ मरीज को सुरक्षित तरीके से सक्रिय रहने और अपनी कार्यक्षमता बनाए रखने में मदद कर सकते है।

दिल्ली की नीलम के लिए हाथ की सूजन से ज्यादा बड़ी थी चिंता

दिल्ली की 39 वर्षीय नीलम के लिए स्तन कैंसर की सर्जरी के बाद एक नई चिंता सामने आई। उनके हाथ में भारीपन और सूजन महसूस होने लगी। उन्हें डर था कि शायद यह समस्या हमेशा उनके साथ रहेगी। उन्होंने बच्चों के साथ खेलना कम कर दिया। घर के कामों में भी पहले जैसी आसानी नहीं रही।

ऑन्कोलॉजी फिजियोथेरेपी विशेषज्ञ की मदद लेने के बाद उनकी स्थिति का आकलन किया गया और उनकी जरूरत के अनुसार शारीरिक पुनर्वास योजना बनाई गई। हाथ की गतिविधियों, शरीर की सही मुद्रा और रोजमर्रा के कामों को सुरक्षित तरीके से करने पर ध्यान दिया गया।

नीलम ने नियमित रूप से बताए गए व्यायाम किए। धीरे-धीरे उनकी गतिविधियों में सुधार महसूस होने लगा। उन्होंने फिर से बच्चों के साथ समय बिताना शुरू किया। लेकिन उनके लिए सबसे बड़ा बदलाव शारीरिक नहीं था। उनका आत्मविश्वास वापस लौट रहा था। नीलम को एहसास हुआ कि शरीर में आए बदलाव उनकी पहचान नहीं हैं। उनकी पहचान उनकी हिम्मत और अपने जीवन को फिर से जीने की इच्छा है।

रेडिएशन के बाद भी शरीर की गति पर ध्यान देना जरूरी

रेडिएशन थेरेपी के बाद कुछ मरीजों में ऊतकों में कठोरता या फाइब्रोसिस  के कारण दर्द और शरीर की गति सीमित हो सकती है। अलग-अलग प्रकार के कैंसर में अलग-अलग शारीरिक समस्याएं सामने आ सकती हैं।

उदाहरण के लिए, सिर और गर्दन के कैंसर के इलाज के बाद कुछ मरीजों को मुंह खोलने में परेशानी हो सकती है। कुछ अन्य कैंसर के उपचार के बाद पेशाब पर नियंत्रण की समस्या भी हो सकती है। इसलिए कैंसर के बाद पुनर्वास में सबसे महत्वपूर्ण बात है- मरीज की जरूरत के अनुसार उपचार। एक ही व्यायाम या एक ही योजना हर मरीज के लिए सही नहीं हो सकती।

हर चरण में साथ देती है ऑन्कोलॉजी फिजियोथेरेपी

ऑन्कोलॉजी फिजियोथेरेपी की भूमिका केवल सर्जरी के बाद शुरू होकर कुछ सप्ताह में खत्म नहीं हो जाती। मरीज की जरूरत के अनुसार यह कैंसर की पहचान के बाद प्री-हैबिलिटेशन से लेकर सक्रिय इलाज, रिकवरी और पेलिएटिव केयर तक अलग-अलग चरणों में उपयोगी हो सकती है। हालांकि यहां सुरक्षा सबसे महत्वपूर्ण है।

जिन मरीजों में बोन मेटास्टेसिस, हड्डियों की कमजोरी या सर्जिकल दुर्बलता के कारण कमजोरी जैसी स्थितियां हों, उनके लिए ऑन्कोलॉजी फिजियोथेरेपी विशेषतज्ञ की सलाह और निगरानी होनी चाहिए। ऑन्कोलॉजी फिजियोथेरेपिस्ट का उद्देश्य मरीज को उसकी स्थिति के अनुसार सुरक्षित तरीके से अधिक सक्रिय और स्वतंत्र बनाने में मदद करना है।

घर बैठे भी मिल सकती है विशेषज्ञ मदद

कैंसर के इलाज के दौरान हर मरीज के लिए बार-बार अस्पताल या क्लिनिक जाना आसान नहीं होता। कमजोरी, थकान या कम इम्युनिटी के कारण यात्रा भी परेशानी का कारण बन सकती है। ऐसे मरीजों के लिए टेली-रिहैबिलिटेशन  एक उपयोगी विकल्प हो सकता है।

वीडियो कंसल्टेशन के जरिए विशेषज्ञ मरीज की स्थिति के अनुसार घर पर किए जाने वाले व्यायाम और गतिविधियों का मार्गदर्शन कर सकते हैं। कई बार हल्के व्यायाम के लिए घर में उपलब्ध साधारण चीजों का भी इस्तेमाल किया जा सकता है। इससे मरीज को अपने घर के आराम में पुनर्वास की प्रक्रिया जारी रखने में मदद मिल सकती है।

स्तन कैंसर के प्रति जागरूकता के लिए गुलाबी (पिंक) रिबन एक महत्वपूर्ण प्रतीक बन चुका है। लेकिन जागरूकता केवल जांच और बीमारी की पहचान तक सीमित नहीं होनी चाहिए।
हमें उस महिला की कहानी भी सुननी चाहिए जो इलाज के बाद अपने शरीर को फिर से समझ रही है। उस महिला की भी, जो सर्जरी के बाद अपना हाथ उठाना सीख रही है।
उसकी भी, जो कीमोथेरेपी की थकान के बीच धीरे-धीरे चलना शुरू कर रही है और उसकी भी, जो लंबे इलाज के बाद पहली बार अपने बच्चे को बिना दर्द के गले लगा रही है।

कैंसर का इलाज जीवन बचाने के लिए होता है। लेकिन ऑन्कोलॉजी फिजियोथेरेपी उस जीवन को फिर से जीने में मदद कर सकती है। कभी यह मदद एक हाथ को फिर से ऊपर उठाने में होती है। कभी कुछ कदम ज्यादा चल पाने में।, कभी सूजन और जकड़न को संभालने में और कभी केवल इतना कि महिला फिर से अपने ऊपर विश्वास कर सके।

आखिरकार, कैंसर से लड़ना पहली जीत है। अपनी स्वतंत्रता, आत्मविश्वास और जीवन की गुणवत्ता को वापस पाना अगली बड़ी जीत है। और यही गुलाबी (पिंक) अक्टूबर के संदेश को पूरे साल जीवित रखने का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हो सकता है।



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नोट: यह लेख मेडिकल रिपोर्टस के आधार पर तैयार किया गया है।

अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।
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