एक दौर ऐसा भी था, जब प्राचीन यूनानी सेरैमिक के टुकड़ों से शौच के बाद सफाई करते थे। वहीं, अमरीका पहुंचे शुरुआती प्रवासी शौच के बाद साफ करने के लिए, मक्के के खाली भुट्टे का प्रयोग करते थे।लेकिन,ज्यादातर मुस्लिम देशों में हाजत के बाद पानी का ही प्रयोग होता है। क्योंकि इस्लाम की शिक्षा में साफ-सफाई के लिए पानी के प्रयोग की सलाह दी गई है।
हालांकि 2015 में तुर्की के धार्मिक मामलों के निदेशालय ने फतवा जारी किया था कि अगर पानी न हो तो मुस्लिम लोग हाजत के बाद टॉयलेट पेपर प्रयोग कर सकते हैं। वहीं, जापान में दोनों ही विकल्प शौचालयों में पाए जाते हैं। ऑस्ट्रेलिया के रिसर्चर जुल ओथमैन कहते हैं कि उनके देश में रहने वाले मुसलमानों ने टॉयलेट पेपर के साथ-साथ पानी का भी इस्तेमाल करना सीख लिया है। इसके लिए वो बाथरूम में या तो बिडेट लगवा लेते हैं या फिर जग में पानी लेकर हाजत के लिए जाते हैं।
नवी मुंबई की रहने वाली आस्था गर्ग भी पश्चिमी देशों की टॉयलेट पेपर इस्तेमाल करने की आदत की शिकार हुईं। जब आस्था सैन फ्रांसिसको में काम करने गईं, तो उन्होंने शौचालय में मग की तलाश शुरू की। वो वहां मौजूद ही नहीं था। शौचालय में पानी का इंतजाम ही नहीं था। बाद में उन्हें एक भारतीय रेस्टोरेंट में जाना पड़ा। आस्था कहती हैं कि कुछ भारतीयों ने शौच के बाद टिश्यू पेपर का प्रयोग करने की आदत डाल दी है। लेकिन ज्यादातर भारतीय अब भी पानी को ही तरजीह देते हैं।
किसी भी भारतीय मूल के लोगों के घरों के शौचालय में पानी का इंतजाम होता है।वहीं, ओथमैन कहते हैं कि ब्रितानियों में तो पॉटी के बाद टॉयलेट पेपर इस्तेमाल करने की जबरदस्त जिद होती है। उनके एक दोस्त ने टॉयलेट पेपर न मिलने पर तो 20 पाउंड के नोट का इस्तेमाल कर लिया। यही वजह है कि अमरीका में आज सबसे ज्यादा टॉयलेट पेपर इस्तेमाल होता है। आस्था गर्ग कहती हैं कि टॉयलेट पेपर के इस्तेमाल से एक समस्या और भी पैदा होती है। लोगों के टॉयलेट चोक हो जाते हैं।
टॉयलेट पेपर का इस्तेमाल चीन में भी आम है। आखिर चीन में ही कागज का आविष्कार हुआ था। लेकिन इसका प्रयोग अमरीकी टॉयलेट पेपर निर्माताओं और विज्ञापन देने वालों ने ज्यादा किया। शौच के बाद सफाई के तरीके पर ही नहीं, कैसे हाजत रफा करें, इस पर भी विवाद है। पश्चिमी देशों में कमोड का चलन ज्यादा है, जिस पर आप आराम से बैठ कर किताब या अखबार पढ़ते हुए फारिग हो सकते हैं। वहीं भारत समेत बहुत से देशों में उकड़ू बैठकर हल्के होने का चलन है।
चीन से आकर अमरीका में बसे कैसर कुओ के सामने भी यही दुविधा थी। वो बताते हैं कि चीन में हान साम्राज्य के दौरान दोनों ही तरह के शौचालयों का प्रयोग चलन में था। आज भी दोनों ही विकल्प चीन के अलग-अलग क्षेत्रों में आजमाए जाते हैं। लेकिन, चीन की ज्यादातर आबादी पुराने शौचालयों यानी उकड़ू बैठने वालों को ही तरजीह देती है।
एक अनुमान के मुताबिक, दुनिया की दो तिहाई आबादी उकड़ू बैठकर ही फारिग होती है। ये साफ-सफाई पसंद लोगों के लिए भी मुफीद है। उकड़ू बैठने से शौचालय से आप का ताल्लुक नहीं होता, जिससे कीटाणुओं का इन्फेक्शन होने की आशंका कम होती है। ब्रिटेन की बहुत सी महिलाएं सार्वजनिक शौचालयों को उकड़ू बैठकर ही इस्तेमाल करती हैं। उकडू बैठने से आप के फारिग होने की प्रक्रिया भी आसान हो जाती है। यही वजह है कि चीन के बहुत से बुजुर्ग घुटनों के बल बैठने के मामले में युवाओं को मात देते हैं।
उधर, अमरीकियों का भी जवाब नहीं, उन्होंने शौच पर जाने को भी मनोरंजन का माध्यम बना लिया है। कोई अखबार लेकर जाता है, तो कोई किताब पढ़ने बैठ जाता है। शौचालय में मोबाइल लेकर वीडियो गेम भी कई लोग खेलते रहते हैं। हालांकि हमारे हिंदुस्तान में शौच के वक्त पढ़ना लिखना बुरा माना जाता है। चीन में भी यही तरबीयत दी जाती है।
मगर, अंग्रेज़ियत या इस पश्चिमी खब्त के मुरीद कुछ ब्राउन साहिब लोग अखबार पढ़ते हैं हाजत के वक्त, समय बचाने के लिए। मलेशिया में सार्वजनिक जगहों पर दोनों ही शौचालयों की सुविधा मिलती है। जिसे जैसा पसंद हो, वो इस्तेमाल कर ले।
मसला सिर्फ हाजत का नहीं गुस्ल का भी है। हम रोज सुबह उठते हैं। दांत साफ करते हैं, फारिग होते हैं और फिर नहा लेते हैं। लैंकेस्टर यूनिवर्सिटी की समाजशास्त्री एलिजाबेथ शोव कहती हैं कि पश्चिमी सभ्यता में सुबह जल्दी नहाने का रिवाज है। इसके लिए वो विश्व युद्ध के बाद विज्ञापन में आए उछाल को जिम्मेदार बताती हैं। जिम्बाबवे में लाइफबॉय साबुन और अमरीका में आइवरी साबुन का जमकर प्रचार किया गया।
यही वजह थी कि साबुनों के विज्ञापन की वजह से रेडियो और टीवी पर आने वाले सीरियलों को सोप ओपेरा कहा जाता था। क्योंकि इनके प्रायोजक साबुन निर्माता होते थे।आज चेहरे की सफाई के लिए फेस वॉश हैं, तो शरीर के बाकी हिस्सों के लिए बॉडी वॉश भी आ गए हैं। लेकिन, ये चलन हालिया है। इसकी वजह ये थी कि लोग बार-बार नहाने लगे हैं।
बारबरा शोव बताती हैं कि ब्रिटेन में दो पीढ़ी पहले ही लोग हफ्ते में केवल दो बार नहाते थे। पहले पानी रोजाना नहीं आता था। पानी की किल्लत से ऐसी आदत थी। पानी की नियमित सप्लाई होने लगी, तो रोज का नहाना-धोना होने लगा। वैसे रोज नहाने की आदत को पानी की उपलब्धता से जोड़ना ठीक नहीं। पानी की किल्लत वाले देश जैसे मलावी में भी भले ही आधी बाल्टी पानी से स्नान हो, मगर लोग दिन भर में दो से तीन बार नहा लेते हैं।
यही आदत घाना, फिलीपींस, कोलंबिया और ऑस्ट्रेलिया के लोगों में भी देखी जाती है। हालांकि हर बार नहाते वक्त वो बाल भी धोएं, ये जरूरी नहीं होता। मजे की बात ये है कि गर्म मौसम ही नहीं, ब्राजील में तो लोग सर्दियों के दिनों में भी कई बार नहाते हैं। आज रोजाना सुबह नहाने की आदत, हमारे कामकाजी जीवन की वजह से है। लोग सुबह काम पर जाने से पहले खुद को तैयार करते हैं, क्योंकि उन्हें दूसरों की नजर में गंदा दिखना ठीक नहीं लगता। ये गैर-पेशेवराना माना जाएगा।
इसका जवाब है नहीं। क्योंकि गर्म पानी से बार-बार नहाने से आप की त्वचा और बाल रूखे हो जाते हैं। इसीलिए बहुत सी महिलाएं नहाएं भले रोज, मगर अपने बाल हफ्ते में दो या तीन दिन ही धोती हैं। कुछ लोगों का कहना है कि नहा लेने से ताजगी आ जाती है। लेकिन, बेहतर ये हो कि सोने से पहले नहाया जाए। इससे बदन आराम की मुद्रा में आ जाता है।
वैसे भी साफ-सफाई और नहाना-धोना हर संस्कृति और इलाके के हिसाब से बदलने वाली आदत है। हो सकता है कि खुद को इको-फ्रैंडली बताने के लिए पश्चिमी देशों के लोग भविष्य में ये एलान कर दें कि वो तो हफ्ते में एक बार ही नहाते हैं, ताकि पानी बर्बाद न हो।बाथरूम की आदतें, हमारी सांस्कृतिक तरबीयत का हिस्सा होती हैं। बचपन से हमें क्या सिखाया-पढ़ाया जाता है, ये आदतें उसी पर निर्भर करती हैं।
ये लेख बीबीसी की अजीब-ओ-गरीब पश्चिमी देश सिरीज का हिस्सा है। 2010 में ब्रिटिश कोलंबिया यूनिवर्सिटी की एक टीम ने कहा था कि मनोविज्ञान के बहुत से रिसर्च पश्चिमी देशों पर आधारित हैं। हम इनके आधार पर ये समझ बैठते हैं कि यही दुनिया के लिए मिसाल हैं। जबकि पश्चिमी देशों के मुकाबले बाकी दुनिया की आदतें और विचार अलग हैं। कई मामलों में पश्चिमी देशों के लोगों की आदतें बहुत अजीब होती हैं।
इसे ही आज मानक मानना ठीक नहीं होगा। तमाम संस्कृतियों की सोच और बर्ताव में फर्क होता है। ये फर्क खान-पान से लेकर नहाने-धोने और शौच की आदतों तक में साफ नजर आता है। इसीलिए, रोजमर्रा की किसी भी आदत को मानक मानना ठीक नहीं है।लेकिन, एक दौर ऐसा भी था, जब लोग नहाने के इस नियम का शिद्दत से पालन नहीं करते थे। वहीं, भारत समेत बहुत से देशों में उकडू बैठ कर हल्के होने का चलन भी है।