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AI & Health: कैंसर से लड़ाई में स्मार्ट हथियार बना एआई, ब्रेस्ट-स्किन कैंसर का शुरुआत में ही लगा सकता है पता

Thu, 16 Apr 2026 07:47 PM IST
Abhilash Srivastava हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

कैंसर के समय रहते निदान में अब एआई डॉक्टरों की मदद कर रहा है। मेडिकल रिपोर्ट्स से पता चलता है कि स्किन-लंग्स कैंसर हो या फिर ब्रेस्ट कैंसर, एआई की मदद से इन सभी के खतरे को पहले ही अंदाजा लगाया जा सकता है। पढ़िए ये रिपोर्ट
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कैंसर का बढ़ता जोखिम - फोटो : Amarujala.com
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विस्तार
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दो दशकों पहले तक हृदय रोग-कैंसर का नाम सुनते ही लोगों के मन में सबसे पहला ख्याल आता था- अब तो मौत पक्की है। हालांकि समय के साथ मेडिकल साइंस, आधुनिक उपचार पद्धति और नई दवाओं ने गंभीर बीमारियों के इलाज को काफी आसान बना दिया है। अत्याधुनिक तकनीक न सिर्फ बीमारियों को समय रहते पहचानने में मदद कर रही है बल्कि प्रभावी उपचार की मदद से हर साल होने वाली लाखों मौतों के खतरे को भी कम कर रही है।

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अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई, हेल्थकेयर सेक्टर के लिए वरदान साबित हो रहा है। जहां पहले किसी बीमारी के शुरुआती पहचान में वर्षों लग जाते थे, वहीं अब एआई की मदद से न केवल समय रहते बीमारियों का पता चल रहा है, बल्कि कई मामलों में तो एआई वर्षों पहले खतरे को लेकर भी अलर्ट कर दे रहा है।

अमर उजाला में हाल ही में प्रकाशित रिपोर्ट में हमने बताया कि किस तरह से एआई दिल की बीमारियों को भांप कर 5 साल पहले ही हार्ट फेलियर का अलर्ट कर सकता है।
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कैंसर के समय रहते निदान में भी एआई डॉक्टरों की मदद कर रहा है। मेडिकल रिपोर्ट्स से पता चलता है कि स्किन-लंग्स कैंसर हो या फिर ब्रेस्ट कैंसर, एआई की मदद से इन सभी के खतरे का पहले ही अंदाजा लगाया जा सकता है। इससे रोगियों का इलाज आसान हो रहा है और तमाम तरह के कैंसर से होने वाली सालाना मौतों को कम करने में भी मदद मिल रही है।

स्किन कैंसर और इसका जोखिम - फोटो : Adobe Stock
स्किन कैंसर के जोखिमों को पहले ही पहचान सकता है एआई

एक हालिया अध्ययन की रिपोर्ट में पाया गया है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस उन लोगों में शुरुआती खतरे के पैटर्न की पहचान कर सकता है, जिन्हें मेलेनोमा होने का खतरा अधिक होता है। मेलेनोमा एक गंभीर प्रकार का स्किन कैंसर है, जो रंग पैदा करने वाली कोशिकाओं (मेलानोसाइट्स) में विकसित होता है। स्वीडन में व्यस्कों की आबादी से एकत्र किए गए डेटा में इसका खुलासा हुआ है।
 
  • अध्ययन में शामिल किए गए 60.36 लाख लोगों में से 38,582 (0.64 प्रतिशत) लोगों को अध्ययन के पांच वर्षों के दौरान मेलेनोमा हो गया।
  • एआई के मॉडल ने 73 प्रतिशत मामलों में उन लोगों की पहचान में मदद की, जिनमें कैंसर होने का जोखिम अधिक था। 

गोथेनबर्ग यूनिवर्सिटी में डर्मेटोलॉजी के प्रोफेसर सैम पोलेसी ने कहा, हमारे विश्लेषणों से पता चलता है कि ज्यादा जोखिम वाले समूहों की स्क्रीनिंग से निगरानी में इससे मदद मिल सकती है।

कैंसर के मामलों का जितनी जल्दी पता चलता है, इलाज सफल रहने और जान बचने की संभावना उतनी अधिक हो जाती है। कैंसर से होने वाली मौतों का एक बड़ा कारण भी यही रहा कि अक्सर लोगों में इसका पता ही तब चल पाता है जब कैंसर काफी फैल चुका होता है।

स्तन कैंसर का जोखिम - फोटो : Adobe stock
स्तन कैंसर का समय पर पता चलना भी हो गया आसान

वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन (डब्ल्यूएचओ) के मुताबिक दुनियाभर में महिलाओं में कैंसर के जितने भी नए मामले सामने आते हैं, उनमें से लगभग हर चौथा मामला (24%-32%) ब्रेस्ट कैंसर का होता है। हर साल 23 लाख से ज्यादा नए मामले सामने आने के साथ, यह दुनिया भर में सबसे आम कैंसर है, जो लगभग हर देश की महिलाओं को प्रभावित करता है।

एआई ने इस कैंसर के जोखिमों की भी समय रहते पहचान को अब आसान बना दिया है। 
 
  • गूगल, इंपीरियल कॉलेज लंदन और नेशनल हेल्थ सर्विस (एनएचएस) के एक हालिया अध्ययन में बताया कि एआई ने स्क्रीनिंग टेक्नोलॉजी में विशेष मदद की है। इससे महिलाओं में ब्रेस्ट कैंसर की समय रहते पहचान में मदद मिल रही है। 
  • एक्सपेरिमेंटल रिसर्च एआई सिस्टम ने 25% "इंटरवल कैंसर" की पहचान की, जो पहले छूट गए थे। 
  • ये ऐसे मामले होते हैं जो आम तौर पर पारंपरिक स्क्रीनिंग से बच निकलते हैं और लक्षण दिखने के बाद ही सामने आते हैं। ऐसे में इनका इलाज करना मुश्किल हो जाता है। 
  • यह रिसर्च सिर्फ स्कैन की सटीकता से कहीं आगे जाती है। यह अपनी तरह का पहला अध्ययन है जो दिखाता है कि जब एआई की मदद से ब्रेस्ट कैंसर की स्क्रीनिंग काफी आसान हो सकती है।
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लंग्स कैंसर और इसका जोखिम - फोटो : Adobe Stock
लंग्स कैंसर का पता लगाने में भी मिल रही मदद

स्किन और ब्रेस्ट कैंसर के साथ लंग्स कैंसर, इसके खतरे और रोगी के जिंदा रहने की संभावनाओं का पता लगाने में भी एआई मदद कर रहा है। नई रिसर्च से पता चलता है कि किसी व्यक्ति की 'फेस एज' कितनी है, यह उसकी असल उम्र से ज्यादा उसकी जीवित रहने की संभावना के बारे में बता सकता है। 
 
  • शुरुआती स्टेज के नॉन-स्मॉल सेल लंग्स कैंसर वाले बुजुर्गों के अध्ययन में हार्वर्ड शोधकर्ताओं ने पाया कि एआई की मदद से इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता है किसी रोगी की कुल जीवित रहने की अवधि कितनी अधिक हो सकती है। 
  • जामा नेटवर्क में प्रकाशित रिपोर्ट में पाया गया है कि एआई लंग्स कैंसर के जोखिमों का अंदाजा लगाने में काफी मददगार हो सकता है।
  • डीप लर्निंग से अनुमानित चेहरे की उम्र ने कुल जीवित रहने की संभावना का पूर्वानुमान लगाया। 
  • चेहरे की उम्र में हर 10 साल की वृद्धि के साथ मृत्यु दर का जोखिम 39% अधिक पाया गया।
     



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स्रोत:
1. AI identifies early risk patterns for skin cancer
2. Diagnostic accuracy, fairness and clinical implementation of AI for breast cancer screening: results of multicenter retrospective and prospective technical feasibility studies



अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।
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