डॉ. सुरेश जाधव
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कोरोना वैक्सीन को लेकर रिसर्च कितनी आगे बढ़ी है?
- हमारे सीईओ अदार पूनावाला भी बता चुके हैं कि कंपनी कई तरह के प्रयासों पर काम कर रही है। उनमें से जो भी पहले तैयार होगा और प्रमाण देगा कि हां, ये कारगर है, तब कंपनी उसको लेकर आगे बढ़ेगी।
ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के साथ चल रहे काम की प्रगति क्या है?
- हम ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के साथ मिलकर काम कर रहे हैं, जिनका क्लिनिकल ट्रायल चल रहा है। शुरुआती चरण के ट्रायल के अच्छे परिणाम सामने आए हैं। इसमें हम काफी आगे निकल गए हैं। 15-20 दिनों में मानव शरीर पर ट्रायल के कुछ दिनों में जब अच्छे परिणाम आएंगे तो हम वैक्सीन का प्रॉडक्शन शुरू कर देंगे। अभी इसमें समय है।
कंपनी खुद कितने तरीकों पर काम कर रही है?
- हमारी कंपनी अभी पांच तरीकों पर काम कर रही है। इनमें से जिसमें भी उम्मीद दिखेगी, उस तरीके को लेकर हम आगे बढ़ेंगे। क्लिनिकल ट्रायल और परिणामों के अध्ययन की एक लंबी प्रक्रिया होती है।
वैक्सीन के लिए कब तक उम्मीद की जा सकती है?
- अभी निश्चित कुछ नहीं कहा जा सकता। फेज वन ट्रायल चल रहा है और देखा जाएगा कि इसके कोई नकारात्मक या विपरीत परिणाम नहीं हो रहे तो फिर हम आगे बढ़ेंगे। जानवरों पर क्लिनिकल ट्रायल के बाद जब इंसानों पर ट्रायल शुरू होता है, तो सबसे पहले स्वस्थ शरीर पर इसका प्रयोग किया जाता है। इसके बाद अलग-अलग आयुवर्ग के लोगों पर ट्रायल किया जाएगा कि वैक्सीन सभी आयुवर्ग में सही प्रभाव छोड़ता है या नहीं, सुरक्षित है या नहीं। जब तक इसकी गारंटी नहीं हो जाती, हम आगे नहीं बढ़ सकते।
इसके आगे की प्रक्रिया क्या होती है?
- इसके बाद फेज टू क्लिनिकल ट्रायल की प्रक्रिया होती है, जिसमें डोज तय किया जाता है कि कितना लगेगा यानी उसका वॉल्यूम कितना होगा। एक डोज में काम करेगा या ज्यादा डोज देने होंगे। इसके बाद प्रक्रिया आती है, जिसमें देखा जाता है कि वैक्सीन से जो एंटीबॉडीज तैयार होती है, वह कोरोना को न्यूट्रिलाइज करने में यानी उससे लड़ने में कारगर होती है या नहीं। यह फेज थ्री ट्रायल ग्रुप में पता चलता है।
डीजीसीआई की भूमिका क्या होती है? अध्ययन में कितना समय लग सकता है?
- कोरोना संक्रमित और स्वस्थ दोनों ग्रुप में वैक्सीन का प्रभाव देखा जाता है। दोनों की कंपरेटिव स्टडी यानी तुलनात्मक अध्ययन किया जाता है। इसके लिए सरकार की शीर्ष दवा नियामक एजेंसी ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया से अनुमति लेनी होती है। डीजीसीआई अनुमति देते हैं कि कितने लोगों पर ट्रायल करें। और फिर लोगों में देखना होता है कि एंटीबॉडी कितने दिनों तक चल रही है।
- ऐसा नहीं कि बुखार हो गया और फिर खत्म हो गया तो इसका मतलब नहीं कि यह सफल है। अभी आपने देखा होगा कि वुहान में फिर से कोरोना संक्रमण के मामले सामने आए हैं। यानी लोग दोबारा संक्रमित हो सकते हैं।
- हेपेटाइटिस-बी, खसरा वगैरह बीमारियों में एक बार डोज कंप्लीट होने के बाद दोबारा जरूरत नहीं होती, लेकिन पोलियो में लगातार सालों तक टीकाकरण अभियान चलाना पड़ा। यह देखना होगा कि कोरोना में भी ऐसी जरूरत हो सकती है या नहीं।
आने वाले समय में वैक्सीन उपलब्ध होगी!
पीएमओ के वैज्ञानिक सलाहकार विजय राघवन ने कहा था कि वैक्सीन बनाने में कम से कम आठ महीने लगेंगे। इन सारी प्रक्रियाओं में अमूमन कितना समय लग जाता है?
- उन्होंने ट्रायल की सारी प्रक्रियाओं की एक मानक अवधि के मुताबिक आकलन कर बताया है। अगर हर फेज के ट्रायल समय से चलते रहे, इसके सकारात्मक परिणाम आते रहे और डीजीसीआई की ओर से अनुमति मिलती रहे, तो नियत समय पर वैक्सीन उपलब्ध हो पाएगा। अन्यथा ज्यादा समय भी लग सकता है।
इस्रायल, ब्रिटेन वगैरह दावा कर रहे हैं कि उन्होंने वैक्सीन बना लिया है !
- अभी सभी जगह ट्रायल ही चल रहे हैं। ब्रिटेन की ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी ने बंदरों पर ट्रायल किया, जिसके अच्छे परिणाम सामने आए हैं और अब इंसानी शरीर पर ट्रायल चल रहा है। इस्रायल ने भी दावा किया है, लेकिन वहां भी जानवरों पर ट्रायल किया गया है। चूहों के शरीर में एंटीबॉडी बनी भी है। लेकिन यह तय नहीं है कि चूहों की ही तरह मानव शरीर में भी मजबूत एंटीबॉडी बन ही जाएगी और यह कोरोना से लड़ने में कारगर हो जाएगी। जो एंटीबॉडी जानवरों में काम कर रहे हों, जरूरी नहीं कि इंसानों में भी कारगर हों। इसलिए हमें अभी इंतजार करना होगा। उम्मीद है कि आने वाले समय में वैक्सीन उपलब्ध होगी।