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आईवीएफ की दो साइकिल फेल होने के बाद माता-पिता बने रिचा-प्रवीण, जानिए इसकी चार आधुनिक तकनीक

Fri, 05 Oct 2018 10:17 AM IST
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रिचा और प्रवीण कुमार दिल्ली में रहते हैं। दोनों मल्टीनेशनल कंपनी में सीनियर पोजिशन पर हैं। इनके पास भगवान का दिया सब है, लेकिन संतान नहीं । तमाम कोशिशों के बावजूद रिचा प्रेग्नेंट नहीं हो पा रही थी। कुछ वर्षों तक तो दोनों एक-दूसरे को सांत्वना देते रहे, पर अब उनकी हिम्मत जवाब देने लगी। कई डॉक्टर्स से सलाह लेने के बाद भी वे संतान सुख की प्राप्ति नहीं कर सके। रिचा और प्रवीण ने आईवीएफ (इन-विट्रो फर्टिलाइजेशन) का भी सहारा लिया, लेकिन दो प्रयास फेल हो गए।

नि:संतान कपल के लिए आईवीएफ को उत्तम विकल्प माना जाता है, लेकिन रिचा और प्रवीण को दो बार निराशा मिली थी पर इस जोड़े ने हिम्मत नहीं हारी और आई वी एफ की नयी तकनीको को अपनाया, इनके सहारे रिचा को गर्भधारण हुआ और आज वह अपनी संतान के साथ बेहद खुश हैं। आइए आपको बताते हैं कि आईवीएफ के पहले दो साइकिल फेल होने के बाद भी ऐसी कौन सी तकनीक हैं, जिनसे रिचा को मां बनने का सुख प्राप्त हुआ।

सबसे पहले आईवीएफ के बारे में समझें: आईवीएफ एडवांस टेक्निक है, जिसकी मदद से संतान प्राप्ति अधिक उम्र और जटिल समस्याओ में भी संभव है । यह सहायक प्रजनन तकनीक है, जिसकी मदद से गर्भधारण करने में असमर्थ महिलाओं को गैर कुदरती तरीके से गर्भ धारण (कृत्रिम गर्भधान) कराया जाता है। गर्भधारण के बाद सारी प्रक्रिया सामान्य pregnancy जैसी ही है |

क्या है आईवीएफ की प्रक्रिया: इस तकनीक में लैब में महिला के एग को पुरुष के स्पर्म से फर्टिलाइज कराया जाता है। आईवीएफ के जरिए फर्टिलाइज्ड एग को महिला के गर्भाशय में रखा जाता है जिससे गर्भधारण हो जाता है, महिला के शरीर में फेलोपियन ट्यूब में होने वाली निषेचन की प्राथमिक प्रक्रिया ही आई वी एफ के तहत लैब में की जाती है |

आजकल आईवीएफ की चार नवीन तकनीक बेहद अहम हैं।

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पहली तकनीक- ICSI मतलब इंट्रा साइटोप्लाजमिक स्पर्म इंजेक्शन है जिसके बारे में इंदिरा आईवीएफ चंडीगढ़ सेंटर आईवीएफ स्पेशलिस्ट डॉ. हिमांशु चौधरी का कहना है इस तकनीक का इस्तेमाल उस स्थिति में किया जाता है, जब पुरुष में स्पर्म की संख्या कम होती है। ICSI की मदद से पुरुष के सीमेन में से स्वस्थ शुक्राणु चुना जाता है और सीधा स्त्री के एग में इंजेक्ट कर दिया जाता है। शुक्राणु को स्त्री के एग में डालने के बाद वह फर्टिलाइज हो जाता है। इसके बाद भ्रूण (एम्ब्र्यो) को स्त्री के गर्भाशय में प्रत्यारोपित किया जाता है। इस तकनीक में सफलता की संभावनाए अधिक रहती है | नील शुक्राणु की स्थिति में सीधे टेस्टिस से शुक्राणु लेकर (टीसा तकनीक) पिता बना जा सकता है ।

दूसरी तकनीक- लेजर हैचिंग है जिसके बारे में इंदिरा आईवीएफ देहरादून सेंटर की आईवीएफ स्पेशलिस्ट डॉ. ऋतू पुन्हानी बताती है यह प्रक्रिया अपनाने की जरूरत तब पड़ती है, जब महिला की उम्र ज्यादा हो या पहले कोई बीमारी रही हो। ऐसी महिलाओं की भ्रूण की बाहरी परत मोटी हो जाती है इस कारण भ्रूण उसे तोड़कर बाहर बच्चेदानी पर चिपक नहीं पाता है। लेजर असिस्टेड हैचिंग प्रक्रिया में भ्रूण की बाहरी परत को लेजर द्वारा कमजोर कर दिया जाता है जिससे गर्भधारण की संभावना औसत से अधिक बढ़ जाती है।

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तीसरी तकनीक- ब्लास्टोसिस्ट कल्चर है जिसके बारे में इंदिरा आईवीएफ के गोरखपुर सेंटर की नि: संतानता एवं आईवीएफ स्पेशलिस्ट डॉ. शिखा मुखीजा का कहना है सामान्यतया भ्रूण को 2-3 दिन लैब में रखा जाता है जबकि ब्लास्टोसिस्ट कल्चर प्रक्रिया में भ्रूण को लैब में ही 5-6 दिन तक विकसित किया जाता है फिर प्रत्यारोपित किया जाता है, इस तकनीक में सफलता की सम्भावनाये अधिकतम होती हैं।

चौथी तकनीक - जोना फ्री एंब्रियोट्रांसफर है, जिसके बारे में इंदिरा आईवीएफ के दिल्ली में पटेल नगर स्थित सेंटर की आईवीएफ स्पेशलिस्ट डॉ. शिप्रा निगम बताती है जो महिला की उम्र ज्यादा होने की वजह से ब्लास्टोसिस्ट बनने के बाद भी गर्भाशय में इम्प्लांट नहीं हो पाता है। ब्लास्टुला की आउटर कवरिंग का अधिक कड़ा हो जाना ही इसका कारण होता है। डॉक्टर कवरिंग को कमजोर करने के लिए लेजर का सहारा लेते हैं। इसके बाद फर्टिलिटी सरल हो जाती है।

रिचा ने असफलता मिलने के बाद भी आई वी एफ की नवीन तकनीक से संतान प्राप्ति कर ली, अगर आप भी इस तरह की समस्या से परेशान है तो बिना किसी हिचक के फर्टिलिटी एक्सपर्ट से बात करे।

निःसंतानता से जुड़ा आपका कोई भी सवाल है तो इन्दिरा आईवीएफ कि वेबसाइट विजिट करे www.indiaivf.in, अपनी समस्या लिखें या एक्सपर्ट डॉ. से बात करने के लिए कॉल करें - 07229944449

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