इस रिपोर्ट के नतीजों को लेकर आईपास फाउंडेशन के सीईओ विनोज मेनिन कहते हैं कि आपदा प्रबंधन के दौरान प्रजनन स्वास्थ्य सुविधाएं हमेशा प्रभावित होती हैं, जिसके चलते अनचाहे गर्भधारण और असुरक्षित गर्भपात बढ़ जाते हैं। कुछ ऐसी ही स्थितियां कोरोना महामारी के दौरान भी बनीं। महिलाओं को गर्भपात और गर्भनिरोध के सुरक्षित तरीके नहीं मिल सके। इसके पीछे कई कारण जिम्मेदार थे।
- महिलाएं अस्पतालों और क्लीनिक तक नहीं पहुंच पा रही थीं। एक तो लोग कोविड के कारण अस्पताल जाने से डर रहे थे और दूसरा परिवहन बंद था।
- लॉकडाउन के दौरान पुलिस की सख्ती थी और बाहर निकलने वाले को कारण बताना जरूरी थी। ऐसे में ये बताना कि गर्भपात के लिए अस्पताल जा रहे हैं, थोड़ा मुश्किल होता है। इसलिए भी लोग बाहर निकलने में झिझक रहे थे।
- केमिस्ट की दुकानें कम खुल रही थीं। लॉकडाउन में गर्भपात की दवाइयों की आपूर्ति हर जगह पर एक जैसी नहीं थी।
- कोविड के चलते स्वास्थ्य सेवाओं पर बोझ काफी बढ़ गया। कई अस्पतालों को कोविड फैसिलिटी बना दिया गया। डॉक्टर और नर्स कोविड ड्यूटी में लगा दिए गए। हालांकि, ऐसा करना जरूरी भी था। पर इससे अन्य बीमारियों के इलाज पर
असर पड़ा।
- निजी अस्पतालों में पहले महीने में कई ओपीडी बंद रहीं और क्लीनिक खुलने बंद हो गए। डॉक्टर और स्टाफ में कोरोना वायरस का डर था, स्टाफ अस्पताल या क्लीनिक नहीं पहुंच पा रहे थे और उस वक्त सुरक्षात्मक उपकरण भी आसानी से
उपलब्ध नहीं थे।
असुरक्षित गर्भपात का नुकसान
फेडरेशन ऑफ ऑब्सटेट्रिक एंड गाइनेकोलॉजिकल सोसाइटीज ऑफ इंडिया (फॉगसी) के वाइस प्रेजिडेंट डॉ. अतुल गनात्रा कहते हैं, 'महिलाओं को कोई परेशानी ना हो इसके लिए सरकार और डॉक्टर्स की तरफ से काफी कोशिशें की गई थीं। वीडियो कॉल के जरिए मरीजों से बात की और उन्हें सही सलाह दी गई। फिर भी इस दौरान कॉन्ट्रेसिप्टव पिल्स, कॉपर टी और गर्भपात की दवाइयां की कमी देखी गई थी।'
जब महिलाएं सुरक्षित तरीके से गर्भपात नहीं कर पातीं तो वो असुरक्षित तरीके अपनाती हैं। डॉक्टर अतुल बताते हैं कि महिलाएं घर पर गर्भपात करने के लिए पपीता, गर्म चीजें खा लेती हैं, दाई के पास जाती हैं या बिना मेडिकल सलाह के कोई दवाई ले लेती हैं। लेकिन, इससे उन्हें इंफेक्शन हो सकता है और उनकी जान भी जा सकती है। वहीं, तबीयत बिगड़ जाने पर आपदा के हालात में उनका इलाज होना भी मुश्किल हो जाता है।
सही स्वास्थ्य सुविधा ना मिलने से महिला ही नहीं उसके पूरे परिवार की जिंदगी प्रभावित होती है। विनोज मेनन एक उदाहरण देते हुए बताते हैं कि सर्वे के दौरान एक मामला आया, जिसमें एक गांव की महिला के चार बच्चे थे और वो पांचवा बच्चा पैदा नहीं करना चाहती थी। लेकिन, वो लॉकडाउन में गर्भपात नहीं करा पाई और अब उसे पांचवा बच्चा भी पैदा करना पड़ा।
हमारे देश में समय-समय पर आपदाएं आती रहती हैं। कहीं बाढ़, कहीं सूखा तो कहीं तूफान। ऐसी स्थितियों में स्वास्थ्य सुविधाओं का प्रभावित होना स्वाभाविक है। महिलाएं भी इसके असर से बच नहीं पातीं। विनोज मेनन कहते हैं, 'हर आपदा में महिलाओं का प्रजनन स्वास्थ्य प्रभावित होता है, लेकिन अमूमन ये आपदाएं सीमित क्षेत्र में और सीमित समय के लिए आती हैं तो उनमें महिलाओं की प्रजनन संबंधी परेशानियों पर किसी का ध्यान नहीं जाता। तब खाना, रहना, दवाइयां और कपड़े आदि उपलब्ध कराने और आपदा के नुकसान को कम करने पर ज्यादा जोर होता है।'
डॉक्टर अतुल का कहना है कि ये बात समझना होगी कि किसी भी आपदा में डिलीवरी नहीं रुक सकती, गर्भपात भी एक तय समयसीमा में होना जरूरी है। लेकिन, आपदा कई महीनों तक रह गई तो गर्भपात का समय निकल जाएगा। ऐसे में महिला को अनचाहा गर्भधारण करना पड़ेगा। इसलिए ये एक तरह से आपात स्वास्थ्य जरूरतें हैं जो नजरअंदाज नहीं की जा सकतीं।'
आपदा प्रबंधन में कैसे इसे प्राथमिकता से जगह दी जाए इसके लिए विनोज मेनन और डॉक्टर अतुल कुछ सुझाव देते हैं।
- प्रजनन सुविधाओं को आपदा प्रबंधन का हिस्सा बनाना चाहिए। हर राज्य में आपदा प्रबंधन एजेंसी है, वो अपनी योजना में इस बात पर भी गौर करे कि कैसे विषम स्थितियों में गर्भनिरोध और गर्भपात की सुविधा दी जा सकती है।
- हमें नए तरीके खोजने होंगे जैसे टेली मेडिसिन। लोगों को अस्पताल आने की जरूरत ना हो। वो वीडियो कांफ्रेंसिंग या व्हाट्सऐप वीडियो कॉल के जरिए डॉक्टर से संपर्क कर सकें।
- महिलाओं को प्रजनन संबंधी समस्याओं में सहयोग के लिए एक हेल्पलाइन बनाई जाए, ताकि महिलाओं को गर्भनिरोध, गर्भपात और प्रजनन संबंधी सलाह एक जगह पर मिल सके।
- गर्भपात और गर्भनिरोधक दवाइयों का स्टॉक रखा जा सकता है। उन्हें अन्य जरूरी दवाइयों का हिस्सा बना सकते हैं। जिस तरह सैनेटरी पैड पहुंचाए जाते हैं उसी तरह जरूरतमंदों को डॉक्टरी सलाह पर ये दवाइयां दी जा सकती हैं।