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कहीं जैविक हथियार तो नहीं है कोरोना वायरस? आशंकाओं में उलझने की बजाय कारगर उपाय ढूंढना जरूरी

Sun, 15 Mar 2020 02:09 PM IST
निलेश कुमार रवींद्र दुबे, वरिष्ठ पत्रकार

सार

हजारों लोगों की जान ले चुका कोरोना वायरस इंसानों में कैसे आया? यह किसी प्रयोग का हिस्सा तो नहीं? कहीं इसका विकास वुहान की प्रसिद्ध जैविक प्रयोगशाला में तो नहीं हुआ?  मुमकिन है, किसी बड़ी चूक के चलते यह वायरस वहां से बाहर आ गया हो। आशंकाएं कई हैं, लेकिन इनमें उलझने की बजाय जरूरी है कि कोरोना से निपटने के कारगर उपाय ढूंढे जाएं।
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यह सवाल पूरी दुनिया की फिजा में तैर रहा है कि यह किसी जैविक युद्ध या बायोलॉजिकल वार का प्रयोग तो नहीं है। - फोटो : PTI
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विस्तार
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न कहीं एलान-ए-जंग हुआ, न कहीं फौज तैनात हुई न कहीं कोई बमबारी हुई। लेकिन दुनिया भर में दहशत फैल गई। इस दहशत की वजह कोरोना नामक एक ऐसा वायरस है, जो धड़ाधड़ लोगों को बीमार करता जा रहा है। इसने पूरी दुनिया में हाहाकार मचा रखा है। 125 से ज्यादा देशों में इस वायरस ने कहर बरपा रखा है। एक अनुमान के अनुसार दुनिया भर में इस वायरस के संक्रमण से एक लाख से ज्यादा मामले सामने आ चुके हैं और इन पंक्तियों के लिखे जाने तक चीन में अचानक उपजे कोरोना वायरस के संक्रमण से 3000 से ज्यादा लोगों की जान जा चुकी है। हालांकि इससे मरने वालों के ताजा आंकड़े पिछले कुछ हफ्तों के मुकाबले काफी कम है। 

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यह वायरस केवल चीन तक ही सीमित नहीं है। दक्षिण कोरिया में भी रोज नए मामले सामने आ रहे हैं। वहां संक्रमित लोगों की संख्या 6300 के पार हो गई है और मौतों का आंकड़ा भी 42 के ऊपर जा चुका है। यह वायरस पिछले साल दिसंबर में सबसे पहले चीन के वुहान शहर में करना शुरू हुआ। उसके बाद धीरे-धीरे चीन और फिर पूरी दुनिया में तेजी से फैल गया। इस वायरस से महाबली अमेरिका सहित अनेक देश पूरी तरह आतंकित हैं। इस आतंक की वजह यह है कि इसके दुष्प्रभावों पर कोई चिकित्सीय शोध उपलब्ध ना होने से इलाज के प्रति पूरी तरह से अनभिज्ञता है। यानी जान बचाने का तरीका मालूम नहीं है। 

इतिहास गवाह है कि जब भी इस तरह की कोई अनसुलझी पहेली सामने आती है तो साजिशों की बू आने लगती है। आज से तकरीबन 35 साल पहले भोपाल में जब एक कारखाने से गैस का रिसाव हुआ था और 3000 से अधिक लोग नींद में ही काल कवलित हो गए थे। तब भी हालात कुछ ऐसे ही थे, उसका भी इलाज मालूम नहीं था और बड़े-बड़े विषविज्ञानी या वायरोलॉजिस्ट भी बगले झांक रहे थे। ऐसे में यह शुबहा होना लाजमी था कि वह दुर्घटना थी या रसायनिक युद्ध का कोई प्रयोग था? 
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ऐसा ही कुछ संदेह कोरोना वायरस और उसके एकाएक फैलाव को लेकर भी जाहिर किया जा रहा है। यह सवाल पूरी दुनिया की फिजा में तैर रहा है कि यह किसी जैविक युद्ध या बायोलॉजिकल वार का प्रयोग तो नहीं है। या फिर चीन से जैविक आतंकवाद या बायोटेररिज्म की शुरुआत तो नहीं होने जा रही है। हालांकि कहीं से भी इसकी अधिकारिक पुष्टि नहीं हो पाई है और होने के आसार भी कम है। बहरहाल यह सवाल न सिर्फ अपनी जगह मौजूद है, बल्कि कइयों को परेशान किए हुए हैं। 

1980 से ही जैविक हथियारों का इस्तेमाल कई देश करते आ रहे हैं - फोटो : Social media
जैविक युद्ध में जैविक एजेंटों का इस्तेमाल जीवित लोगों को मारने के लिए किया जाता है। सामूहिक नरसंहार के लिहाज से भी इसे काफी मुफीद समझा जाता है। यह सस्ता भी पड़ता है और इसके भंडारण के लिए कोई बहुत ज्यादा जगह इस्तेमाल नहीं होती है। ऐसा होना बेवजह भी नहीं है। जैविक हथियारों का इस्तेमाल सदियों से होता रहा है। विश्व में ऐसे अनेक उदाहरण हैं, जहां जैविक हथियारों का युद्ध में या जनसाधारण को नुकसान पहुंचाने के इरादे से जबरदस्त इस्तेमाल हुआ है। 

1980 से ही जैविक हथियारों का इस्तेमाल कई देश करते आ रहे हैं। 1980 से 1988 तक  इराक ने फारस की खाड़ी के युद्ध में इरान के खिलाफ मस्टर्ड गैस, सरीन, एंथ्रेक्स, बॉट्यूलिम टॉक्सिन और अफलाटॉक्सिन का उपयोग किया। इससे ठीक कुछ साल पहले 1984 में दार्शनिक से भगवान बने एक धर्मगुरु के चेलों ने ओरेगॉन में रेस्तरां की खाद्य सामग्रियों में साल्मोनेला की मिलावट कर 750 लोगों को बीमार कर दिया। इससे उन्हें सालमोनेलोसिस नामक बीमारी हो गई जो आंतों को संक्रमित कर देती है।

1986 में श्रीलंका में सक्रिय तमिल गुरिल्लाओं ने श्रीलंका के चाय उद्योग की कमर तोड़ने के लिए चाय में पोटेशियम साइनाइड मिला दिया। 1993 में एक ओम शिनरिक्यो नामक जापानी संप्रदाय ने टोक्यो की इमारतों की छतों से एंथ्रेक्स का हवाई छिड़काव किया। उसी साल ईरान ने अमेरिका और यूरोप की फौजों की जलापूर्ति में एक अज्ञात जैविक तत्व की मिलावट कर दी। 1995 में मिनेसोटा मिलिशिया ग्रुप के दो सदस्यों के पास स्थानीय सरकारी अफसरों से बदला लेने की खातिर रखा हुआ रिसिन बरामद किया गया। इसी साल उक्त जापानी संप्रदाय ओम शिनरिक्यो ने टोक्यो के सबवे रेल सिस्टम में सरीन गैस छोड़ी। इसके अगले साल यानी 1996 में ओह्यो का एक शख्स ब्यूबोनिक प्लेग के कल्चर हथियाता हुआ पकड़ा गया।
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जैविक हथियारों का प्रयोग तो पहले विश्व युद्ध के समय से होता रहा है - फोटो : Social media
जैविक आतंकवाद की अगली कार्रवाई 2001 में हुई, जब अमेरिकी डाक सेवा से गुजरने वाले सात लिफाफों में फ्लोरिडा, वाशिंगटन, न्यूयॉर्क, न्यूजर्सी में एंथ्रेक्स के वायरस पाए गए। 22 लोग रोगग्रस्त हुए, जिनमें से पांच अपनी जान से हाथ धो बैठे। 2002 में इंग्लैंड के मैनचेस्टर में रिसिन का उत्पादन करते हुए आतंकवादी पकड़े गए, जिनकी रूसी दूतावास पर हमला करने की योजना थी। 

ये तो महज चंद हालिया उदाहरण है। जैविक हथियारों का प्रयोग तो पहले विश्व युद्ध के समय से होता रहा है, जब जर्मन और फ्रेंच एजेंटों ने एक दूसरे के खिलाफ मांस विंडो और एंथ्रेक्स का प्रयोग किया था। दूसरे विश्वयुद्ध की शुरुआत में पहले जापानियों ने एंथ्रेक्स, प्लेग, हैजा और शिगेलोसिस जैसी बीमारियों को जन्म देने वाले जैविक हथियारों का उत्पादन किया। इन हथियारों का उपयोग चीनी युद्ध बंदियों और नागरिकों पर किया गया, जिनका नतीजा कई हजार मतों के रूप में हुआ। ऐसे ही एक प्रयोग में प्लेग संक्रमित पिस्सुओं और दानों से भरे हुए सिरेमिक बम, नानकिंग समेत चीनी शहरों पर फेंके गए, जिससे बड़ी संख्या में इससे पीड़ित चूहे बाहर निकल आए और महामारी फैल गई। जब दूसरा विश्व युद्ध शुरू हुआ, जापान ने इन बीमारियों का जैविक हथियारों के रूप में इस्तेमाल किया। 

बाद में अन्य कई देशों ने जैविक हथियारों का प्रयोग कर उन्हें विकसित किया। दरअसल संक्रामक रोग और युद्ध हमेशा से ही एक दूसरे से जुड़े हुए रहे हैं। जब यह समझ भी विकसित नहीं हो पाई थी कि बीमारियां कैसे फैलती है, तब भी यह बोध था कि मरे जानवर और इंसान बीमारियां फैलाते हैं। जहरीले तीरों और दुश्मन की सेनाओं के जलस्रोतों को जहरीला करने के रूप में जैविक युद्ध के अनेक उदाहरण मिलते हैं। हालांकि इतिहासकारों और माइक्रोबायोलॉजिस्टों के लिए सही जानकारी के अभाव में प्राय: प्राकृतिक महामारी और जैविक हमलों में भेद कर पाना मुश्किल रहा है और फिर कालांतर ने भी अतीत के यथार्थ को तोड़ा मरोड़ा है।
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