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Chhath Puja 2025: छठ पूजा क्यों की जाती है? जानिए कैसे मनाया जाता है सूर्य उपासना का यह पवित्र पर्व

Fri, 24 Oct 2025 01:34 PM IST
शिवानी अवस्थी लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

Chhath Puja 2025: छठ पूजा 2025 कब से शुरू हो रही है? जानिए नहाय-खाय से उषा अर्घ्य तक की संपूर्ण विधि, तिथियां और सूर्य पूजा का महत्व।
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Chhath Puja 2025 - फोटो : Amar Ujala
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विस्तार
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हिंदू धर्म में छठ पूजा को महापर्व के रूप में मनाया जाता है। इस दिन छठी मैया की पूजा होती है, सूर्य भगवान की उपासना की जाती है और बेहद कठिन व्रत धारण किया जाता है। हालांकि इस व्रत की महिमा छठ पूजा के दौरान देखने को मिलती है जब ताल, नदियों और घाटों पर महिलाएं छठ पूजा के लिए बड़ी संख्या में एकत्र होती हैं। छठ पूजा 4 दिनों का पर्व है। सूर्य देव की उपासना का महापर्व छठ पूजा बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और देशभर के श्रद्धालुओं के लिए सिर्फ एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आस्था, अनुशासन और पवित्रता का प्रतीक है। आइए जानते हैं कि इस वर्ष छठ पूजा कब मनाई जा रही है? छठ पूजा क्यों मनाई जाती है और कैसे इसे मनाना चाहिए।

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छठ पूजा कब है?

वर्ष 2025 में छठ पूजा का पर्व 25 अक्टूबर,  दिन शनिवार से शुरू होकर 28 अक्टूबर, मंगलवार तक मनाया जाएगा। चार दिनों तक चलने वाले इस पर्व की शुरुआत ‘नहाय-खाय’ से होती है। दूसरे दिन खरना, तीसरे दिन संध्या अर्घ्य और चौथे दिन ऊषा अर्घ्य के बाद व्रत का पारण होता है।

कैसे मनाते हैं छठ पूजा?

  • छठ पूजा के पहले दिन नहाय खाए मनाते हैं। इस दिन घर की पवित्रता और सात्त्विक भोजन का विशेष ध्यान रखा जाता है।
  • दूसरे दिन खरना पर व्रती सूर्य को गुड़ और दूध से बने प्रसाद का भोग लगाकर निर्जला व्रत की शुरुआत करते हैं।
  • तीसरे दिन शाम को डूबते सूर्य को संध्या अर्घ्य दी जाती है।
  • चौथे दिन उगते सूर्य को ‘उषा अर्घ्य अर्पित किया जाता है।

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इस पूजा में व्रती महिलाएं व्रत के दौरान बिना पानी पिए उपवास रखती हैं, यह अनुशासन और तप का सर्वोच्च उदाहरण माना जाता है। छठ में ठेकुआ, सूप, केले, गन्ने और कद्दू-भात जैसे पारंपरिक प्रसाद का विशेष महत्व होता है।

क्यों करते हैं छठ पूजा ?

यह पर्व हमें याद दिलाता है कि सूर्य न केवल ऊर्जा का स्रोत है, बल्कि जीवन का आधार भी है। छठ पूजा के हर नियम के पीछे प्रकृति के साथ सामंजस्य और आत्मसंयम का गहरा संदेश छिपा है।आधुनिक युग में भी यह पर्व हमें सिखाता है कि आस्था तभी सार्थक है जब वह अनुशासन और कृतज्ञता के साथ जुड़ी हो।

 

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