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अमरीकी कवयित्री माया एंजेलो की कविता 'सबक'

Thu, 06 Jan 2022 12:02 AM IST
काव्य डेस्क अमर उजाला काव्य डेस्क - नयी दिल्ली

सार

मैं फिर से मरती रहती हूँ।
नसें निढाल होकर, खुल जाती हैं
सोए हुए बच्चों की
नन्हीं मुट्ठियों की तरह।
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विस्तार
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मैं फिर से मरती रहती हूँ।
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नसें निढाल होकर, खुल जाती हैं
सोए हुए बच्चों की
नन्हीं मुट्ठियों की तरह।
पुरानी कब्रों की यादें,
सड़ता मांस और कीड़े
मुझे यकीन नहीं दिला पाते
चुनौती के लिए कितने ही बरस
और उदासीन शिकस्त बस गए
मेरे चेहरे की झुर्रियों की गहराई में।
मेरी आँखों को धुंधला कर देते हैं वे, फिर भी
मैं मरती रहती हूँ,
क्योंकि मुझे जिंदगी प्यारी है।

अनुवाद : सरिता शर्मा, हिन्दी समय के साभार 
 
 
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