गिरीश कर्नाड : लड़कियों के साथ ने बनाया संवेदनशील

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Ratnesh Mishra

गिरीश कर्नाड

मैंने खुद को फिल्मकार की तुलना में एक बेहतर नाटककार पाया है। यही वजह है कि मैं नाटक ज्यादा विश्वास के साथ लिखता हूं और इसकी शैलियों पर प्रयोग करना मेरे लिए फिल्म निर्देशन की तुलना में ज्यादा आजाद अनुभव है।  मेरा जन्म 1938 में माथेरन, महाराष्ट्र के एक संपन्न कोंकणी परिवार में हुआ था। जब मैं चौदह वर्ष का था, तब हमारा परिवार कर्नाटक के धारवाड़ में आकर रहने लगा और मैं वहीं पला-बढ़ा । कर्नाटक विश्वविद्यालय से स्नातक की उपाधि लेने के बाद मैं आगे की पढ़ाई के लिए बॉम्बे (मुंबई) आ गया, लेकिन तभी मुझे प्रतिष्ठित रोड्स छात्रवृत्ति मिल गई और मैं इंग्लैंड चला गया,  जहां मैंने ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के लिंकॉन तथा मॅगडेलन महाविद्यालयों से दर्शनशास्त्र, राजनीतिशास्त्र तथा अर्थशास्त्र में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की।  पहले कवि बनने का इरादा था  जब मैं बड़ा हो रहा था, तब मेरे परिवेश में नाटक मंडलों या नाटक कंपनियों का बोलबाला था । मेरे माता-पिता को नाटकों का शौक था । उनके साथ मैं भी नाटक देखने जाता था। यहीं से नाटकों ने मेरे मन में जगह बना ली थी।  मैं बचपन से ही ‘यक्षगान’ का उत्साही प्रशंसक रहा हूं। पर बाईस की उम्र होने तक मेरी जिंदगी की सबसे बड़ी महत्वाकांक्षा कवि बनने की थी। यहां तक कि जब मैं अपना पहला और सबसे प्रिय नाटक 'ययाति' लिख रहा था, तब नाटकों में रुचि होने के बावजूद मैंने नाटककार बनने का नहीं सोचा था।  महिलाओं को बारीकी से समझता हूं  मेरी परवरिश दो बहनों, एक भांजी और घर के सामने रहने वाले अंकल की चार बेटियों के साथ हुई है। सात लड़कियों के साथ रहने के कारण मैं महिलाओं की सोच को बेहद बारीकी से समझता हूं। यही वजह है कि मेरे नाटकों में महिला चरित्र बिल्कुल नैसर्गिक प्रतीत होता है। मुझे भारत से इंग्लैंड पहुंचने में तीन हफ्ते लग गए थे और मैं चाहकर भी निर्धारित तीन वर्षों से पहले अपने मुल्क वापस नहीं लौट सकता था। 1963 में इंग्लैंड से वापस लौटने के बाद मैं मद्रास (चेन्नई) की ऑक्सफोर्ड प्रेस में विभिन्न प्रकार के भारतीय लेखन को सामने लाने के काम से जुड़ गया। इससे रचनात्मक कौशल को संवारने में मदद मिली।  फिल्मों से ज्यादा नाटक पसंद है  जब मैंने नाटक लिखना शुरू किया था, तब कन्नड़ साहित्य पर पश्चिम का गहरा प्रभाव था। 1970 में मैंने अनंतमूर्ति के उपन्यास पर आधारित 'संस्कार' से बतौर फिल्म स्क्रीनराइटर और अभिनेता शुरुआत की थी। उसके बाद मैंने कई फिल्मों के लिए काम किया, पर हमेशा से ही पसंदीदा क्षेत्र नाटक ही रहा। नाटक लिखने के दौरान इसकी शैलियों पर प्रयोग करना मेरे लिए फिल्म निर्देशन की तुलना में ज्यादा आजाद अनुभव है।  हर नाटक पर की खूब मेहनत  मैं किसी भी ऐतिहासिक कहानी पर नाटक लिखने से पहले उस विषय के विद्वानों से मिलकर नोट्स तैयार करता हूं। मुझे उन कवियों और लेखकों से नफरत है, जो एक ही जगह बैठकर अपना काम पूरा कर लेते हैं। मैंने हमेशा अपने नाटकों पर मेहनत की है। जब मैंने तुगलक लिखा, तो सोचा था कि कोई इसमें दिलचस्पी नहीं लेगा, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। मुझे समझ में आ गया कि नाटक बच्चों की तरह होते हैं, जो अपनी योग्यता के आधार पर आगे बढ़ते हैं।  - गिरीश कर्नाड हाल में टाटा साहित्य लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड के लिए चुने गए  प्रख्यात नाटककार के साक्षात्कारों पर आधारित।   
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