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फिल्म साधना का मार्मिक गीत- औरत संसार की किस्मत है, फिर भी तकदीर की हेती है

रत्नेश मिश्र, काव्य डेस्क, नई दिल्ली Updated Wed, 27 Jun 2018 09:43 AM IST
साधना
औरत ने जनम दिया मर्दों को, मर्दों ने उसे बाजार दिया
जब जी चाहा कुचला मसला, जब जी चाहा दुत्कार दिया

1958 में बनी फिल्म 'साधना' के लिये यह गीत साहिर लुधियानवी ने लिखा। साहिर का जन्म 8 मार्च 1921 को हुआ था, और ठीक इसी दिन 1911 में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर एक बड़े आंदोलन की शुरुआत हुई। अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की। साहिर इस दुनिया में इस शुरुआत के एक दशक बाद आते हैं। हजारों वर्षों की गैरबराबरी के ख़िलाफ महिलाओं की सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक बराबरी के लिये यह एक बड़ी पहलकदमी थी। 

तुलती है कहीं दीनारों में, बिकती है कहीं बाजारों में
नंगी नचवाई जाती है, ऐय्याशों के दरबारों में
ये वो बेइज्जत चीज है जो, बंट जाती है इज्जतदारों में
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औरत के लिये रोना भी खता

चूंकि साहिर का जीवन उथल-पुथल से भरा रहा है और उन्होंने औरतों की गैरबराबरी को अपने जीवन में बहुत नजदीक से महसूस किया था। साहिर की मां को उनके पिता ने तलाक दे दिया था। इस अलगाव के बाद मां-बेटे पर जो दुखों का पहाड़ टूटा उसने साहिर के अंदर उमड़-घुमड़ कर आकार ले रहे एक गीतकार व शायर को महिलाओं की बदतर सामाजिक स्थिति से रू-ब-रू करवा दिया।  

मर्दों के लिये हर जुल्म रवां, औरत के लिये रोना भी खता
मर्दों के लिये लाखों सेजें, औरत के लिये बस एक चिता
मर्दों के लिये हर ऐश का हक, औरत के लिये जीना भी सजा
 

जिन होठों ने इनको प्यार किया, उन होठों का व्यापार किया

इसीलिये साहिर के गीतों-नज़्मों और शायरी में स्त्रियों की पीड़ा उनके पूरे सामाजिक परिवेश के साथ उभरकर आता है। फिल्म साधना का यह गीत अपनी पूरी आबादी के एक बड़े तबके यानि महिलाओं की बदहाल स्थिति के लिये जिम्मेदार पुरुषवादी-सामंती- पितृसत्तात्मक ढ़ांचे की असलियत बयां करता है। 

जिन होठों ने इनको प्यार किया, उन होठों का व्यापार किया
जिस कोख में इनका जिस्म ढला, उस कोख का कारोबार किया
जिस तन से उगे कोंपल बन कर, उस तन को जलील-ओ-खार किया

मर्दों ने बनायी जो रस्में, उनको हक का फरमान कहा
औरत के जिन्दा जल जाने को, कुर्बानी और बलिदान कहा
किस्मत के बदले रोटी दी, उसको भी एहसान कहा
 

संसार की हर एक बेशर्मी, गुर्बत की गोद में पलती है

एन. दत्ता के संगीत से सजे इस गीत को आवाज दी लता मंगेशकर ने। फिल्म की कहानी एक वेश्या और प्रोफेसर के इर्द गिर्द घूमती है। लेकिन गीत एक वेश्या के जीवन के अनछुए और संवेदनशील पहलू को उकेरता है। हमारा समाज अब उन स्थितियों से कमोबेश बाहर निकल रहा है जिसका कारण स्त्रियों का फ्रंट पर आकर अपनी लड़ाई खुद लड़ना और हर मोर्चे पर खुद को साबित करना है। लेकिन पुरुषवादी मानसिकता की जड़ें उस प्रथाओं और व्यवस्था की गहरी खाइयों में गहरे धंसी हुई हैं, इसलिये नारीवाद की प्रासंगिकता लंबे समय तक बनी रहेगी। 

संसार की हर एक बेशर्मी, गुर्बत की गोद में पलती है
चकलों में ही आ के रुकती है, फाकों में जो राह निकलती है
मर्दों की हवस है जो अक्सर, औरत के पाप में ढलती है

औरत संसार की किस्मत है, फिर भी तकदीर की हेती है


गीतकार साहिर इस तरह की सामाजिक विषमता के पीछे गरीबी को भी एक बड़ा कारण मानते थे। गरीबी एक अभिशाप है जिसका सीधा असर महिलाओं और बच्चों पर पड़ता है। गरीबी एक स्त्री को किस कदर बेकदर करती है और उसे कहां ले आकर खड़ी करती है, गीत की पंक्ति-'संसार की हर एक बेशर्मी, गुर्बत की गोद में पलती है' से समझा जा सकता है। गीत समाज में फैले दोहरे मापदंडो को बखूबी उजागर करता है। 

औरत संसार की किस्मत है, फिर भी तकदीर की हेती है
अवतार पैगंबर जनती है, फिर भी शैतान की बेटी है
ये वो बदकिस्मत मां है जो, बेटों की सेज पे लेटी
 

महिलाओं को मजबूती देता है गीत

हम अपनी तमाम उम्र जिन रश्मों और रिवाजों के दायरें जीते हैं, उसमें कई बार जाने-अनजाने किस तरह अपराध कर रहे होते हैं, पता ही नहीं चलता। ऐसे समय में ये गीत हमें रास्ता दिखाता है। गीत न केवल महिलाओं को मजबूत होने के लिये प्रेरित करता है बल्कि पुरुषों को भी एक अच्छा पिता, पति और बेहतर इंसान बनने की राह प्रशस्त करता है। यही चीजें हमें एक बराबरी वाले समाज के निर्माण का मार्ग दिखाती हैं। 

औरत ने जनम दिया मर्दों को, मर्दों ने उसे बाजार दिया
जब जी चाहा कुचला मसला, जब जी चाहा दुत्कार दिया

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