नारी नहीं नदी हो तुम

Vinay Tiwari Updated Tue, 06 Mar 2018 03:01 PM IST
हे नदी  तुम कमज़ोर न पड़ना, न घबराना, न ही डरना तुम्हें कुछ नहीं होगा, बस ये परिवर्तन का वक्त है, तुम्हारा अस्तित्व नहीं खत्म हो रहा बस स्वरूप बदल रहा है पहले तुम सिर्फ बहती थी, देखो अब उड़ना भी सीख गयी। जाओ उड़ जाओ दूर गगन में, और बन जाओ 'मेघ' नहीं रिमझिम वाले नहीं, खूुंखार, डरावने, तवाही वाले जिसकी गर्जना मात्र से, लोग भयभीत हो जायें फिर तुम बरसना वापस इसी धरती पर, खूब बरसना, और करना दोस्ती तूफानों से, फिर ले आना एक तबाही, सब कुछ बहा ले जाना, कुछ न छोड़ना। तुम्हें यह तबाही अरावली की श्रेणियों के उस पार भी लानी होगी। बेसक तुम गंगा हो, बन जाना होगा तुम्हें अदृश्य 'सरस्वती' जिसका वजूद कभी नहीं खत्म होगा। तुम पवित्र और पूज्यनीय रहेगी। - हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।  आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें। 
Disclaimer

अपनी वेबसाइट पर हम डाटा संग्रह टूल्स, जैसे की कुकीज के माध्यम से आपकी जानकारी एकत्र करते हैं ताकि आपको बेहतर अनुभव प्रदान कर सकें, वेबसाइट के ट्रैफिक का विश्लेषण कर सकें, कॉन्टेंट व्यक्तिगत तरीके से पेश कर सकें और हमारे पार्टनर्स, जैसे की Google, और सोशल मीडिया साइट्स, जैसे की Facebook, के साथ लक्षित विज्ञापन पेश करने के लिए उपयोग कर सकें। साथ ही, अगर आप साइन-अप करते हैं, तो हम आपका ईमेल पता, फोन नंबर और अन्य विवरण पूरी तरह सुरक्षित तरीके से स्टोर करते हैं। आप कुकीज नीति पृष्ठ से अपनी कुकीज हटा सकते है और रजिस्टर्ड यूजर अपने प्रोफाइल पेज से अपना व्यक्तिगत डाटा हटा या एक्सपोर्ट कर सकते हैं। हमारी Cookies Policy, Privacy Policy और Terms & Conditions के बारे में पढ़ें और अपनी सहमति देने के लिए Agree पर क्लिक करें।