वो ज़माने

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Thakur S

कहां महफिल के अब वो ज़माने रहे, बिख़रे-बिख़रे से सारे तराने रहे, अपनों की गिनतियां अब सिमटने लगीं, बस नये कुछ और कुछ पुराने रहे ।। साथ बैठे थे और थे सुनाये कभी, बनके यादें लतीफे और गाने रहे, कहाँ महफिल के अब वो ज़माने रहे।। साथ जो भी थे दूरी बनाते गये, जो बेग़ाने थे अब भी बेग़ाने रहे, कहाँ महफिल के अब वो ज़माने रहे।। पीछे छूटा है यारों हसीं क़ाफिला, सारी ख़ुशियों के जिसमें ख़जाने रहे, कहां महफिल के अब वो ज़माने रहे।। - ठाकुर समीक्षा  हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।  आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें। 
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