भुला दो सारे अफसाने

Saroj Yadav Updated Wed, 07 Mar 2018 12:53 PM IST
कभी मैं खिलखिलाती हूं उदासी है कभी मुझमें कभी गाने को जी करता कभी पानी है आंखों में समझ आता नहीं आखिर तुम्हारा ये असर है कैसा न बोलो तो ग़मों गुस्सा जो बोलो तो दीवाली है मैं चाहूं लाख समझाना समझना मन नहीं चाहे तुम्हें सोचा करे हरदम यही आदत बना ली है बहारों का बयां क्या है नजर देखे तो मालूम हो तुम्हीं बसते हो नजरों में नहीं दुनिया ही खाली है जरा भी वक्त मिल जाये तो जख्मों को मेरे देखो कभी तुम देखोगे आकर तभी ये सूरत निकाली है जमाने की सभी उलझन कभी क्या खत्म होती है ये दुनिया ग़म से खाली है न तरकीबों से खाली है भुला दो सारे अफसाने जो जंजीरों की मानिंद हैं परिंदों की तरह उड़ जा तो फिर दुनिया निराली है चलो हम साथ चलते हैं किनारा खोजना ही है सफर आसान ही होगा तो क्यों दूरी बना ली है - हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।  आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें। 
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