बेटे की कशमकश

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Rajendra Singh

तुमने जीवन दिया उसने जीना सिखाया तू मां है वो ममता है तू दिल है वो धड़कन है कैसे कह दूं तुम सही या वो गलत तुमने गोद में खिलाया उसने दिल में बसाया दोनों ही ने प्रेम में नहलाया खुशबू तेरी दिल में बसी वो उस खुशबू में रची कैसे कह दूं कौन ज्यादा हसीं? तेरे बिना जीवन कहां उसके बिना मृत्यु कहां दोनों हों मेरे जीवन के पूरक कहां है प्रश्न एकाधिकार का ? जिव्हा तुम हो स्वाद वो है दृष्टि तुम हो दिखती वो है कर्ण तुम हो श्रवण वो है मेरे जीवन का अहसास तुम्ही हो फिर क्यूं कह दूं तुम सही या वो गलत ।। - प्रभात हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।  आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें। हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।  आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें। 
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