मुझमें ही कुछ बुरा सा है

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Prabhakar Nath

mujhme hi kuchh bura sa hai

महाताब उसकी छत का बहुत पूरा सा है चाँद मेरी ही आँगन क्यूं का अधूरा सा है। गैरों से मेलजोल आज कल बढ़ा दी है मैंने अपनों के हाथों फूल भी लगता छुरा सा है। बहुतों ने है मोहब्बत से बहुत रुलाया मुझे अब प्यार भरी नज़र भी लगे जैसे घुरा सा है। बुराइयों को देख न आँखें फेर सका हूँ मैं लगता है शायद मुझमें ही कुछ बुरा सा है। - प्रभाकर नाथ  हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।  आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें। 
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