जीवन को स्वयँ सँवारो तुम

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अतुल अवस्थी

जीवन को स्वयं संवारो तुम संचित भावना निखारो तुम आगत कल क़ा प्रणाम होगा स्वागत फ़िर बार-बार होगा कुछ को पैसों क़ा सम्बल है कुछ को बस अपना ही बल है विश्वास रखो कायम खुद पर विश्वास समस्या क़ा हल है संघर्ष मनुज क़ा आभूषण हर एक समस्या है भूषण जीवन के राग नित्य गाओ बस लक्ष्य तको बढ़ते जाओ जनगण के तुम अधिनायक हो सभ्यता संस्कृति नायक हो आँसू में ख्वाब सजाओ तुम जीवन को नित्य जगाओ तुम - अतुल अवस्थी 'अतुल' हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।  आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें। 
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