खामखां अांखें बदनाम हो गईं

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Garima Anjul

अब ना रोको हमें पहलू में, देखो सुबह से शाम हो गई मिलने आउंगी कल फिर से मैं, जिंदगी तेरे नाम हो गई। तेरी चाहत खींचती मुझको, जैसे कोई लगाम हो गई  बची पहचान तुमसे मेरी, मैं खुद तो गुमनाम हो गई। गये होंगे मयखाने को, खामखां अांखें बदनाम हो गईं कौन पीता भला नज़रों से, आंखें ना हुई जाम हो गईं। मैंने तो की ना कोई ख़ता, अब बेकसूरी इल्जाम हो गई काम की थी पहले बहुत, अब हर कोशिश नाकाम हो गई। - गरिमा   हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।  आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
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