ग़र रोक सके तो ख़ुद को रोक

deepali agrawal Updated Wed, 07 Mar 2018 04:50 PM IST
फ़ीका कर सिंधु का तमगा कल्पना की उड़ान रोक ना निकलें फिर से ये सब हीरे एक एक कर सब ख़दान रोक क्यूं गाती हैं लता ये ऐसा उठ जा इनके गलों को रोक देख ये भागी फिर से दीपा तू भी भग खेलों को रोक सबको पीट देती है मैरी उतर रिंग, मुक्कों को रोक ओह ! क्वीन बनी ये कंगना औकात बता फ़िल्मों को रोक फिर रण में आई लक्ष्मीबाई तू आ, ऐसे जज़्बों को रोक लिखने चलीं ये कुछ महादेवी कलम पकड़, शब्दों को रोक चलीं इंदिरा सुशासन लाने देश के सब लोगों को रोक मदर टेरेसा सेवा करती कुछ कर, ऐसे भावों को रोक बनी नीरजा देख बहादुर, तू सब साहसी मनों को रोक, सुन ! ये ना रूकेंगी लाख तू रोके ग़र रोक सके तो ख़ुद को रोक - हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।  आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें। 
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