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अली सरदार जाफरी: कल्पना और यथार्थ का लाजवाब शायर

अमर उजाला, काव्यडेस्क, नई दिल्ली Updated Tue, 31 Jul 2018 03:16 PM IST
Ali Sardar Jafri
अब आ गया है जहाँ में तो मुस्कुराता जा 
चमन के फूल दिलों के कँवल खिलाता जा 

अदम हयात से पहले अदम हयात के बाद 
ये एक पल है उसे जावेदाँ बनाता जा 

भटक रही है अँधेरे में ज़िंदगी की बरात 
कोई चराग़ सर-ए-रहगुज़र जलाता जा 


आधुनिक उर्दू शायरी की दुनिया में सरदार जाफरी शायरना महफिलों में वैचारिक स्तर पर बतौर कम्युनिष्ट दाखिल हुए। शुरुआत में उन्हें लोग तीखी नज़रों से देखते थे लेकिन उनके शेरों के मार्फ़त लोगों ने जल्द ही स्वीकार कर लिया। उन्होंने उर्दू शायरी की दुनिया में ऊंचा स्थान हासिल किया। 
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दिल की आग जवानी के रुख़्सारों को दहकाए है 

दिल की आग जवानी के रुख़्सारों को दहकाए है 
बहे पसीना मुखड़े पर या सूरज पिघला जाए है 

मन इक नन्हा सा बालक है हुमक-हुमक रह जाए है 
दूर से मुख का चाँद दिखा कर कौन उसे ललचाए है 

मय है तेरी आँखों में और मुझ पे नशा सा तारी है 
नींद है तेरी पलकों में और ख़्वाब मुझे दिखलाए है 


29 नवंबर 1913 को उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले के बलरामपुर में पैदा हुए अली सरदार जाफ़री के घर का माहौल तो ख़ालिस मज़हबी था, लेकिन सरदार छोटी उम्र में ही मर्सिया (शोक काव्य) कहने लगे थे। शुरुआती दिनों के उनके शेर देखिए - 

अर्श तक ओस के कतरों की चमक जाने लगी 
चली ठंडी जो हवा तारों को नींद आने लगी। 

 

जब कम्युनिस्ट पार्टी के सक्रिय सदस्य बने

एंग्लो-एरेबिक कॉलेज देहली से बी.ए और लखनऊ विश्वविद्यालय से एम.ए. करने के बाद जब जाफ़री साहब मुंबई पहुंचे तो कम्युनिस्ट पार्टी के सक्रिय सदस्य बन गए। कई बार जेल भी गए।  

इन्हीं अनुभूतियों से गुज़रते हुए उनके अंदर कहीं शायरी पक रही थी और उनके शोहरत का रास्ता बन रहा था। उनके काव्य रचनाओं में कलात्मकता दिखती है, चाहे वो 'परवाज़' हो 'नई दुनिया को सलाम', 'ख़ून की लकीर', 'अमन का सितारा', 'एशिया जाग उठा' हो या 'पत्थर की दीवार'। 

मैं तुझको भूल गया इसका एतबार न कर 

संघर्ष भी उनकी शायरियों की विशेषता है। रोमांटिक नज़्मों-शेरों में भी संघर्षशीलता की भावना रची-बसी है। 

मैं तुझको भूल गया इसका एतबार न कर 
मगर ख़ुदा के लिए इंतजार न कर 

अजब घड़ी है मैं इस वक्त आ नहीं सकता, 
सरूरे-इश्क़ की दुनिया बसा नहीं सकता,
मैं तेरे साज़-ए-मोहब्बत पे गा नहीं सकता,

मैं तेरे प्यार के काबिल नहीं हूँ प्यार न कर 
न कर ख़ुदा के लिए मेरा इंतज़ार न कर 

रहबरों की भूल थी या रहबरी का मुद्दआ' 

बहुमुखी प्रतिभा के धनी जाफरी साहब ने अवाम की मुक्ति के लिए हर क्षेत्र में अपनी कलम चलाई। साथ ही आज़ादी की लड़ाई में बढ़ चढ़कर भाग लिया और आज़ादी के बाद भी सक्रिय सामाजिक जीवन जिया। 

रहबरों की भूल थी या रहबरी का मुद्दआ' 
क़ाफ़िलों को मंज़िलों के पास भटकाते रहे 

जिस क़दर बढ़ता गया ज़ालिम हवाओं का ख़रोश 
उस के काकुल और भी आरिज़ पे लहराते रहे 

फाँसियाँ उगती रहीं ज़िंदा उभरते ही रहे 
चंद दीवाने जुनूं के ज़मज़मे गाते रहे 

मैं जहाँ तुम को बुलाता हूँ वहाँ तक आओ 

जाफरी को वर्ष 1998 में ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया। वे फिराक गोरखपुरी और कुर्तुल एन हैदर के साथ ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित होने वाले उर्दू के तीसरे साहित्यकार थे। 

उन्हें 1967 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया। वे उत्तर प्रदेश सरकार के 'उर्दू अकादमी ' पुरस्कार और मध्य प्रदेश सरकार के 'इकबाल' सम्मान से भी सम्मानित हुए। उनकी कई रचनाओं का भारतीय और विदेशी भाषाओं में अनुवाद हुआ। जाफरी ने 1 अगस्त 2000 को इस दुनिया को अलविदा कहा।

मैं जहाँ तुम को बुलाता हूँ वहाँ तक आओ 
मेरी नज़रों से गुज़र कर दिल-ओ-जाँ तक आओ 

फिर ये देखो कि ज़माने की हवा है कैसी 
साथ मेरे मेरे फ़िरदौस-ए-जवाँ तक आओ 

हौसला हो तो उड़ो मेरे तसव्वुर की तरह 
मेरी तख़ईल के गुलज़ार-ए-जिनाँ तक आओ
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