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प्यार करता हूँ : कैलाश वाजपेयी

Fri, 11 Feb 2022 10:10 PM IST
काव्य डेस्क अमर उजाला काव्य डेस्क - नयी दिल्ली

सार

माथे की आँच से
डोरा सुलगता है
मोम नहीं गलता
देह बंद नदिया
उफनाती है
नीली फिर काली फिर श्वेत हो जाती है
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विस्तार
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माथे की आँच से
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डोरा सुलगता है
मोम नहीं गलता
देह बंद नदिया
उफनाती है
नीली फिर काली फिर श्वेत हो जाती है
दार्शनिक उँगलियों से
चितकबरे फूल नहीं
झरती है राख
असहाय होता हूँ
जब-जब रिक्त होता हूँ
प्यार करता हूँ
वहीं एक सीढ़ी है नीचे उतरकर
दुनिया कहलाने की।
सागर के नीचे दरार है
किरन कतराती है
पत्थर सरकाकर
राह निकल जाती है
हवा की चोट से
बाँस झुलस जाता है
हरा-भरा अंधकार होता हूँ
प्यार करता हूँ
वही एक शर्त है
ज़िंदा रह जाने की।
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