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हिंदी कविता के यंग एंग्री मैन 'धूमिल' की 2 चुनिंदा रचनाएं

रत्नेश मिश्र

Irshaad
                                    
                     
                                                  पता नहीं कितनी रिक्तता थी-
जो भी मुझमे होकर गुजरा -रीत गया 
पता नहीं कितना अन्धकार था मुझमे 
मैं सारी उम्र चमकने की कोशिश में 
बीत गया

भलमनसाहत 
और मानसून के बीच खड़ा मैं 
ऑक्सीजन का कर्ज़दार हूँ
मैं अपनी व्यवस्थाओं में 
बीमार हूँ
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सिलसिला : धूमिल

हवा गरम है
और धमाका एक हलकी-सी रगड़ का
इंतज़ार कर रहा है
कठुआये हुए चेहरों की रौनक
वापस लाने के लिए
उठो और हरियाली पर हमला करो
जड़ों से कहो कि अंधेरे में
बेहिसाब दौड़ने के बजाय
पेड़ों की तरफदारी के लिए
ज़मीन से बाहर निकल पड़े
बिना इस डर के कि जंगल
सूख जाएगा
यह सही है कि नारों को
नयी शाख नहीं मिलेगी
और न आरा मशीन को
नींद की फुरसत
लेकिन यह तुम्हारे हक में हैं
इससे इतना तो होगा ही
कि रुखानी की मामूली-सी गवाही पर
तुम दरवाज़े को अपना दरवाज़ा
और मेज़ को
अपनी मेज कह सकोगे।
2 years ago
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