दाग देहलवी: रंज की जब गुफ़्तुगू होने लगी... 

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली Updated Wed, 07 Mar 2018 04:31 PM IST
लव ब्रेक
रंज की जब गुफ़्तुगू होने लगी  आप से तुम तुम से तू होने लगी  चाहिए पैग़ाम-बर दोनों तरफ़  लुत्फ़ क्या जब दू-ब-दू[2] होने लगी  मेरी रुस्वाई की नौबत आ गई  उन की शोहरत कू-ब-कू[3] होने लगी  है तेरी तस्वीर कितनी बे-हिजाब  हर किसी के रू-ब-रू होने लगी  ग़ैर के होते भला ऐ शाम-ए-वस्ल[4]  क्यूं हमारे रू-ब-रू होने लगी  ना-उम्मीदी बढ़ गई है इस क़दर  आरज़ू की आरज़ू होने लगी  अब के मिल कर देखिए क्या रंग हो  फिर हमारी जुस्तुजू होने लगी  'दाग़' इतराए हुए फिरते हैं आज  शायद उन की आबरू होने लगी  1.संदेशवाहक, दूत, प्रतिनिधि 2.दो एक साथ, किसी तीसरे के बिना 3.मिलन की शाम 4.हर जगह  

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