साहित्य-सिने-कला संस्था ‘सृजन-संवाद’ ने सफ़लतापूर्वक 11 वर्ष पूरे कर 12वें वर्ष में प्रवेश किया है। 12वें वर्ष की प्रथम गोष्ठी अर्थात इसकी 114वीं गोष्ठी ‘चित्र और नृत्य’ पर केंद्रित रही।
डॉ. विजय शर्मा ने वक्ताओं, टिप्पणीकारों, श्रोताओं-दर्शकों का स्वागत किया। उन्होंने बताया कि ‘सृजन संवाद’ ने साहित्य, सिनेमा तथा विभिन्न कलाओं पर कार्यक्रम प्रत्येक माह गोष्ठी करते हुए 11 वर्षों की सफ़ल यात्रा सम्पन्न की है। इसने अपनी पहचान एक गंभीर मंच के रूप में स्थापित की है। 114वीं गोष्ठी में ‘चित्र और नृत्य’ पर विचार-विमर्श के लिए दिल्ली से चित्रकार अंकित उपाध्याय, बैंगलोर से नृत्यांगना डॉ. स्वप्निल सत्यमबदा तथा इंदौर से प्रसिद्ध चित्रकार राजेश एकनाथ पाटिल एकत्र हुए।
सर्वप्रथम स्व-प्रशिक्षित चित्रकार अंकित उपाध्याय ने पॉवर पॉइंट प्रेजेंटेशन द्वारा अपने रेखांकन से दर्शकों को परिचित कराया। चित्रों की सधी हुई रेखाओं, रंगों तथा पार्श्व में चल रहे मधुर संगीत ने सबका मन मोह लिया। अंकित ने बताया कि चित्रांकन की ओर सबसे पहले उन्हें उनके पिता ने आकर्षित किया। चूंकि वे साहित्यिक परिवार से आते हैं तो घर में कलाकारों तथा साहित्यकारों को बचपन से देख रहे थे। चित्रकार हरिपाल त्यागी ने उन्हें अपनी शैली विकसित करने की प्रेरणा दी और जब वे कुछ मंज गए तो उन्हें त्यागी जी से प्रशंसा मिली जो किसी पुरस्कार से कम न थी। अंकित ने कई माध्यमों का प्रयोग किया अंतत: बात पेंसिल पर आकर ठहरी। वे काली पेंसिल का उपयोग पोट्रेट बनाने में करते हैं जबकि लैंडस्केप के लिए रंगीन पेंसिल उन्हें भाती है। यात्रा और पानी उन्हें अपनी कला के कुछ स्रोत लगते हैं। बीच-बीच में कविता की पंक्तियाँ उद्धृत करते हुए उन्होंने अपनी बात रखी।
गोष्ठी की अगली वक्ता डॉ. स्वप्निल प्रियमबदा ने अपनी माँ के बढ़ावा देने से नृत्य की ओर कदम बढ़ाए बाद में जिसमें पिता का भरपूर सहयोग मिला। दादी उनकी मेहनत देख कर खुश होती थीं। उन्होंने बीएचयू से नृत्य में पीएचडी की, इसके लिए उन्हें राष्ट्रीय स्कॉलरशिप मिली थी। वे अपनी सफ़लता का श्रेय अपनी गुरु लखनऊ घराना की नृत्यांगना रंजना श्रीवास्तव को देती हैं। उनकी गुरु जब नृत्य करती तो दर्शक रो पड़ते थे। यही प्रभाव स्वप्निल अपने नृत्य में लाना चाहती थीं और उन्हें इसमें काफ़ी सफ़लता मिली है। कुछ समय लुधियाना के एक नृत्य कॉलेज में प्रिंसिपल रहने के बाद आजकल वे बैंगलोर में बच्चों को नृत्य सिखा रही हैं। वे स्वयं भी मंच पर नृत्य प्रस्तुत करती हैं साथ ही नृत्य से जुड़े सेमीनार-वर्कशॉप में भाग लेती हैं। उनके पति मूर्तिकार हैं। स्वप्निल सत्यमबदा को कई पुरस्कार प्राप्त हुए हैं।
सृजन संवाद की 114वीं गोष्ठी की एक विशेषता रही कि इसके तीनों वक्ताओं को अपनी कला की ओर मुड़ने में परिवार का सहयोग प्राप्त हुआ। तीसरे और अंतिम वक्ता राजेश एकनाथ पाटिल 1986 से देश-विदेश में अपनी कला का प्रदर्शन करते आ रहे हैं। तमाम पुरस्कारों से सम्मानित राजेश एकनाथ की एकल, युग्म तथा सामूहिक कला प्रदर्शनियाँ निरंतर आर्ट गैलरी में चलती रहती हैं। राजेश एकनाथ के भाई नाटकों से जुड़े थे वहीं से उन्हें लगा कि सब कलाएँ आपस में जुड़ी हुई हैं। उन्होंने रंगों और कूँचियों को चुना। उनके यहाँ हरे तथा लाल रंग की विभिन्न छटाएँ शोभा पाती हैं। वे अपनी चित्रकला में साहित्य, संगीत तथा आध्यात्म का मिश्रण प्रस्तुत करते हैं। भक्तिकालीन काव्य पर वे चित्र शृंखला बना रहे हैं। जिस विषय पर काम करते हैं उससे जुड़े स्थान पर रहने का प्रयास करते हैं, उन्हीं लोगों के बीच रहने की उनकी कोशिश होती है। उन्होंने दर्शकों को अपने चित्र भी दिखाए।
धन्यवाद ज्ञापन कहानीकार गीता दुबे ने किया। पोस्टर परमानंद रमण ने बनाया। मीटिंग की रिकॉर्डिंग दिल्ली की प्रोफ़ेसर डॉ. इला भूषण ने की। डॉ. विजय शर्मा ने वक्ताओं का परिचय दिया तथा उनके वक्तव्य पर टिप्पणी करते हुए कार्यक्रम का संचालन किया। गूगल मीट की इस गोष्ठी में जमशेदपुर, दिल्ली, इंदौर, पूणे, बैंगलोर से बहुत सारे दर्शक जुड़े, उन्होंने इसे देखा, सराहा तथा इस पर टिप्पणियाँ कीं।
‘सृजन संवाद’ की जुलाई माह की गोष्ठी सिने-निर्देशकों पर होनी तय हुई है।