अगर आप भी सेना में भर्ती होकर देश की सरहदों की सुरक्षा करना चाहते हैं तो आपको मेजर जनरल यश मोर से भारतीय सेना में शामिल होने के बाद मिलने वाली एडवेंचर्स से भरी लाइफस्टाइल को जरूर जान लेना चाहिए। हरियाणा के हिसार जिलें में बास गाँव नामक ग्रामीण इलाके में जन्मे जनरल यश मोर ने अपने जीवन में कई ऐसे अद्भुत और अदम्य साहस से भरे कारनामे कर दिखाए हैं जिनके लिए उन्हें न केवल सराहा ही गया है बल्कि उनके इस जज्बे और जुनून को देखकर कई बड़ी जिम्मेदारियां भी सौंपी गई हैं। मेजर जनरल यश मोर अपने परिवार में तीसरी पीढ़ी के अधिकारी हैं। उनकी स्कूली शिक्षा बैंग्लोर के राष्ट्रीय मिलिट्री स्कूल में हुई थी। पढ़ाई के दौरान वह न केवल लिखने-पढ़ने में अव्वल थे बल्कि वाद-विवाद, नाटक और खेलकूद में अभी बढ़चढ़ के हिस्सा लेते रहते थे।
कैसे शुरू हुई इस अधिकारी की सैन्य कहानी
जनरल यश मोर वर्ष 1985 के जून महीने में देश की प्रतिष्ठित भारतीय सैन्य अकादमी, देहरादून से पास आउट हुए और उन्हें भारतीय सेना की सबसे पुरानी इन्फैंट्री बटालियनों में से एक में कमीशन दिया गया। उन्होंने साल 1993 से लेकर 1994 तक मोजाम्बिक में शांति रक्षक के रूप में संयुक्त राष्ट्र में देश का प्रतिनिधित्व किया। वे रक्षा सेवा स्टाफ कॉलेज, वेलिंगटन से स्नातक हैं। साथ ही उन्होंने मद्रास विश्वविद्यालय से रक्षा और सामरिक अध्ययन में एमएससी और राष्ट्रीय विश्वविद्यालय, ढाका, बांग्लादेश से डिफेंस स्टडीज में पोस्ट ग्रैजुएशन भी किया है। इसके अलावा अधिकारी ने उस्मानिया विश्वविद्यालय, हैदराबाद से एम फिल और पीएचडी भी कर रखी है। सेना के इस जांबाज ऑफिसर ने बॉक्सिंग, बास्केटबॉल सहित सभी खेलों में उत्कृष्ट प्रदर्शन किया और नेशनल लेवल तक हैंडबॉल भी खेला है। मेजर जनरल मोर को अपनी पढ़ाई के दौरान सर्वश्रेष्ठ निबंध लेखन के लिए जनरल उस्मानी ट्रॉफी से नवाजा जा चुका है।
कई बार खतरों से भी खेला है ये “खिलाड़ी”
जनरल यश मोर एक अच्छे खिलाड़ी के साथ-साथ साहसी सैनिक भी हैं। उन्हें पंजाब और जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद से लड़ने का अनुभव है। इसके अलावा दक्षिण कश्मीर में काउंटर टेररिस्ट ऑपरेशन के दौरान वीरता के लिए सेना मेडल और आर्मी चीफ कमेंडेशन कार्ड से सम्मानित किया गया था। इस अधिकारी ने व्यापक रूप से अफ्रीका, यूरोप और अमेरिका की यात्रा की है। इसके अलावा वह श्रीलंका और बांग्लादेश की यात्रा भी कर चुके हैं। वह NESA सेंटर, वाशिंगटन डीसी के पूर्व छात्र हैं, जो रणनीतिक मामलों पर एक प्रतिष्ठित अमेरिकी थिंक टैंक है। उन्हें नेतृत्व और प्रेरणा पर कई सैन्य और नागरिक प्रतिष्ठानों में बोलने के लिए अक्सर आमंत्रित किया गया है। आपने 1 गार्ड और एक स्वतंत्र बख्तरबंद ब्रिगेड की कमान संभाली। वे स्टाफ कॉलेज, वेलिंगटन में स्टाफ (प्रशिक्षक) का निर्देशन कर रहे हैं। सेना मुख्यालय में परिप्रेक्ष्य योजना निदेशालय में प्रतिष्ठित रणनीतिक योजना समूह में भी कार्य किया। उन्हें विशेष रूप से लद्दाख में एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक मुख्यालय के पहले जनरल ऑफिसर कमांडिंग (जीओसी) के रूप में चुना गया था। सितंबर 2020 में सेवानिवृत्त होने से पहले, वह डेजर्ट सेक्टर में एक कोर के चीफ ऑफ स्टाफ थे।
बचपन से ही रहा है जुनूनी मिजाज
वह इस उम्र में भी सक्रिय खेल उत्साही रहे हैं। वह लद्दाख के पहाड़ों में नियमित रूप से ट्रेकिंग करते रहे हैं। हाल ही में उन्होंने एक नए जुनून के रूप में साइकिल चलाना शुरू किया है और कम समय में 6000 किलोमीटर की दूरी पूरी की है। वह हिमालय क्षेत्र की नाजुक पारिस्थितिकी के संरक्षण के लिए समर्पित एक गैर सरकारी संगठन सेव द हिमालया फाउंडेशन के सीईओ हैं।
कैसे जुड़ सकते हैं आप
अगर आप भी भारतीय सेना के इस जाबांज ऑफिसर से अपना कोई भी सवाल पूछना चाहते हैं या सेना में भर्ती में होने के बाद किन-किन जिम्मेदारियों का निर्वहन करना पड़ता है, जैसे किसी भी प्रश्न का उत्तर ढूंढ रहे हैं तो अभी इस दिए गए लिंक पर क्लिक कीजिए और सफलता टॉक के चैनल को सबस्क्राइब कीजिए, जिसके बाद शनिवार, 15 जनवरी को आप सीधे मेजर जनरल यश मोर से लाइव जुड़कर अपने सवालों के जवाब पा सकते हैं।