नए सिरे से देखें
हो सकता है कि आप ऐसे मौकों पर भी खुद को असंतुष्ट महसूस करें, जहां आपको इसकी उम्मीद थी। यह भी संभव है कि न चाहते हुए भी आपको बार-बार ऐसे फैसले लेने पड़ें, जिससे आपकी असंतोष की भावना बढ़ जाए। ऐसे में जरूरी है कि आप संतुष्टि के प्रति अपने नजरिये को फिर से परिभाषित करें। सच्चा संतोष पाना है, तो सबसे पहले आपको अपने असंतोष के चक्र को तोड़ना सीखना होगा।
पैसा ही सब कुछ नहीं
पैसा आपको थोड़ी देर के लिए संतुष्टि जरूर दे सकता है, लेकिन असली और स्थायी संतोष नहीं। शोध भी इस बात की पुष्टि कर चुके हैं। दिक्कत तब होती है, जब पैसा आपकी जरूरत का साधन बनने के बजाय आपकी कीमत और पहचान तय करने लग जाए। ऐसे में आप अपने जीवन का असली मकसद भूल जाते हैं और पैसे को ही सब कुछ मानने की गलती करने लगते हैं।
तुलना करने से बचें
तुलना सफलता नहीं, खालीपन लाती है। इसलिए दूसरों की सफलता से अपनी तुलना न करें। जब आपकी नजरें किसी और की कामयाबी पर टिकी रहती हैं, तो आप अपने लक्ष्य की ओर अगला कदम नहीं बढ़ा पाते हैं। आपको अभी तक जो हासिल नहीं हुआ उसके लिए खुद को दोषी ठहराने या दूसरों की उपलब्धियों से जलने के बजाय, अपनी छोटी-सी प्रगति पर भी खुद को सराहें। अपने प्रतिद्वंद्वी के प्रति भी करुणा दिखाएं। उन चीजों के लिए आभार प्रकट करें, जो आपको मजबूत बनाती हों। फिर चाहे वह काम का बेहतरीन अनुभव हो, असफलताएं हों या फिर खुशी के छोटे-छोटे पल।
योगदान के बारे में सोचें
लगातार हिसाब-किताब करने के बजाय यह सोचें कि आपका असली योगदान कहां है। किसके जीवन में आपने सकारात्मक बदलाव लाए हैं? किसे आपने आगे बढ़ने का मौका दिया है? एक बार अपनी आंखें बंद करके उस पल को याद कीजिए, जब आपने सच्चे दिल से संतोष महसूस किया था। यही अनुभव आपको असली और लंबे समय तक चलने वाली स्थायी खुशी देते हैं।