कहते हैं कि अगर हौसले बुलंद हों और इरादे मजबूत, तो गरीबी भी सफलता की राह नहीं रोक सकती। झारखंड की राजधानी रांची के तुरुप गांव की रहने वाली आरती महतो ने इसे सच कर दिखाया है। उनकी मां रानू देवी ने परिवार का पेट पालने और तीन बच्चों को पढ़ाने के लिए बीआईटी मेसरा में सफाईकर्मी के तौर पर काम किया। कभी उन्हें सप्ताह भर की मेहनत के बदले महज 400 रुपये मिलते थे। मां ने तमाम मुश्किलों के बीच बच्चों की पढ़ाई नहीं रुकने दी। अब उनकी बेटी आरती ने उसी बीआईटी मेसरा से इंजीनियरिंग में पीएचडी की उपाधि हासिल कर ली है। इस उपलब्धि के साथ ही वह तुरुप गांव की पहली महिला बन गई हैं, जिन्होंने इंजीनियरिंग के क्षेत्र में डॉक्टरेट की डिग्री प्राप्त की है। बीआईटी मेसरा के विशाल सभागार में आयोजित दीक्षांत समारोह में जब आरती को इंजीनियरिंग में पीएचडी की उपाधि से सम्मानित किया गया, तो यह पल उनके परिवार के लिए बेहद भावुक और गर्व से भरा रहा। यह सिर्फ एक डिग्री हासिल करने की कहानी नहीं है, बल्कि एक मां के 26 वर्षों के संघर्ष, त्याग और बेटी के अटूट संकल्प की जीत भी है।
पति की मौत के बाद तीन बच्चों की जिम्मेदारी, सफाईकर्मी बनकर शुरू किया सफर
आरती की इस कामयाबी के पीछे उनकी मां रानू देवी का लंबा संघर्ष है। पति के निधन के बाद उनके सामने तीन बच्चों के पालन-पोषण और परिवार चलाने की बड़ी जिम्मेदारी आ गई। आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर थी और बच्चों का भविष्य संवारना आसान नहीं था। ऐसे मुश्किल समय में रानू देवी ने बीआईटी मेसरा परिसर में सफाईकर्मी के तौर पर काम करना शुरू किया। उस समय उन्हें सप्ताह भर काम करने के बदले सिर्फ 400 रुपये मिलते थे। सीमित आमदनी में घर चलाना और तीन बच्चों की जरूरतें पूरी करना किसी चुनौती से कम नहीं था। इसके बावजूद उन्होंने बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलाने का सपना नहीं छोड़ा। वह अपनी जरूरतों को पीछे रखकर लगातार मेहनत करती रहीं, लेकिन बच्चों की पढ़ाई में कभी बाधा नहीं आने दी। लंबे समय तक संस्थान में सेवा देने के बाद आज उनका वेतन बढ़कर करीब 15 हजार रुपये प्रतिमाह हो गया है। हालांकि, उनके लिए सबसे बड़ी उपलब्धि बच्चों का भविष्य संवारना रहा। रानू देवी ने कठिन परिस्थितियों में भी अपने बच्चों को आगे बढ़ने का हौसला दिया और उनकी शिक्षा को प्राथमिकता बनाए रखा।
मां के संघर्ष को बनाया ताकत, बीटेक के बाद बीआईटी मेसरा से की पीएचडी
आरती महतो अपने परिवार की मझली संतान हैं। घर की कमजोर आर्थिक स्थिति और तमाम सामाजिक, पारिवारिक व आर्थिक चुनौतियों के बावजूद उन्होंने पढ़ाई जारी रखी। मां की मेहनत और त्याग ने उन्हें आगे बढ़ने की प्रेरणा दी। आरती ने आरटीसी संस्थान से बीटेक की पढ़ाई पूरी की। इसके बाद अपनी योग्यता के दम पर उन्हें बीआईटी मेसरा में दाखिला मिला। यहां उन्होंने एमटेक की पढ़ाई पूरी की और फिर इंजीनियरिंग में शोध कार्य शुरू किया। उनका शोध वायरलेस नेटवर्क और इमेज कम्युनिकेशन जैसे जटिल तकनीकी विषयों पर केंद्रित रहा। इस लंबे अकादमिक सफर में आर्थिक चुनौतियां भी सामने आईं, लेकिन बीआईटी मेसरा और सरकारी स्तर से मिली छात्रवृत्ति ने उनकी पढ़ाई जारी रखने में अहम मदद की। आरती ने अपनी मेहनत, लगन और शैक्षणिक क्षमता के दम पर हर मुश्किल का सामना किया। उन्होंने साबित कर दिया कि प्रतिभा किसी आर्थिक स्थिति की मोहताज नहीं होती। सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने इंजीनियरिंग में डॉक्टरेट की उपाधि हासिल कर अपने परिवार और गांव का नाम रोशन किया।
जमशेदपुर में व्याख्याता हैं आरती, रेलवे में कार्यरत हैं पति
उच्च शिक्षा के क्षेत्र में बड़ी उपलब्धि हासिल करने वाली आरती महतो फिलहाल जमशेदपुर के एक प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थान में व्याख्याता के तौर पर काम कर रही हैं। वह विद्यार्थियों को पढ़ाकर उनके भविष्य को संवारने में योगदान दे रही हैं। वहीं, उनके जीवनसाथी भारतीय रेलवे में सहायक लोको पायलट के पद पर कार्यरत हैं। तुरुप गांव के ग्रामीण परिवेश से निकलकर इंजीनियरिंग में पीएचडी तक पहुंचने वाली आरती की कहानी उन बेटियों के लिए प्रेरणा है, जो सीमित संसाधनों के बीच बड़े सपने देखती हैं। उनकी सफलता बताती है कि मजबूत इरादों और लगातार मेहनत के सामने गरीबी और अभाव की दीवारें भी छोटी पड़ जाती हैं।