, ग्रामीणों ने खुद बना डाली 1.75 किमी सड़क
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झारखंड के खूंटी जिले के उग्रवाद प्रभावित कर्रा प्रखंड से विकास की एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जिसने सरकारी दावों पर सवाल खड़े कर दिए हैं। गलिओंडर गांव के ग्रामीण वर्षों तक जर्जर सड़क की मरम्मत के लिए सरकारी तंत्र और जनप्रतिनिधियों का इंतजार करते रहे, लेकिन जब कहीं से राहत नहीं मिली तो उन्होंने खुद ही सड़क बनाने का फैसला कर लिया। ग्रामीणों ने श्रमदान और आपसी सहयोग से करीब 1.75 किलोमीटर लंबी सड़क को फिर से चलने लायक बना दिया।
श्रमदान और चंदे से शुरू हुआ सड़क निर्माण
लोधमा-बिरदा मुख्य सड़क से गलिओंडर गांव तक जाने वाली सड़क लंबे समय से जर्जर हालत में थी। सड़क की बदहाली से परेशान ग्रामीणों ने आपस में चंदा इकट्ठा किया और जेसीबी मशीन व ट्रैक्टर की व्यवस्था की। इसके बाद महिलाएं, युवा और बुजुर्ग फावड़ा और कुदाल लेकर सड़क पर उतर गए। सभी ने मिलकर मिट्टी डाली, गड्ढों को भरा और सड़क की मरम्मत कर उसे आवागमन के योग्य बना दिया। इस दौरान गांव में एकजुटता की मिसाल देखने को मिली।
जनप्रतिनिधियों से लगाई गुहार, नहीं मिला समाधान
ग्रामीण मोहन महतो और मनोज साहू ने बताया कि सड़क की खराब स्थिति को लेकर कई वर्षों से स्थानीय विधायक और सांसद को ज्ञापन सौंपा जाता रहा, लेकिन समस्या का कोई समाधान नहीं निकला। ग्रामीणों का कहना है कि लगातार मांग के बावजूद जब सड़क नहीं बनी, तब उन्होंने तय किया कि अब सरकारी योजनाओं का इंतजार करने के बजाय खुद ही सड़क की मरम्मत करेंगे।
गांव की जीवनरेखा है यह सड़क
ग्रामीणों के मुताबिक, यह सड़क गांव के लिए जीवनरेखा है। इसी रास्ते से स्कूली बच्चे स्कूल जाते हैं, किसान अपनी फसल बाजार तक पहुंचाते हैं और ग्रामीण रोजमर्रा के कामों के लिए आवागमन करते हैं। बरसात के मौसम में सड़क की हालत इतनी खराब हो जाती थी कि आवाजाही लगभग बंद हो जाती थी। बीमार लोगों को अस्पताल पहुंचाने और जरूरी कामों के लिए भी लोगों को भारी परेशानी उठानी पड़ती थी।
ग्रामीण बोले- यह मजबूरी भी है और आत्मनिर्भरता की मिसाल भी
ग्रामीणों का कहना है कि यह सिर्फ सड़क की मरम्मत नहीं, बल्कि सरकारी उपेक्षा के बीच उनकी मजबूरी और आत्मनिर्भरता की कहानी है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब ग्रामीण खुद सड़क बनाने को मजबूर हैं, तो विकास योजनाओं और सरकारी दावों का लाभ आखिर गांवों तक क्यों नहीं पहुंच रहा है।