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झारखंड: 20 साल पुराने रिश्वत कांड में बड़ा फैसला, मुख्य गवाह मुकरा फिर भी नहीं बचा कर्मचारी; एक साल की सजा

Fri, 16 Oct 2026 09:05 AM IST
आशुतोष प्रताप सिंह न्यूज डेस्क, अमर उजाला, रांची

सार

रांची सिविल कोर्ट की भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (एसीबी) की विशेष अदालत ने जमीन के म्यूटेशन के बदले 700 रुपये रिश्वत लेने के मामले में हल्का कर्मचारी भानु प्रताप प्रसाद को दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई है। अदालत ने आरोपी को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की संबंधित धाराओं के तहत एक-एक साल के कठोर कारावास और प्रत्येक धारा में 10,000 रुपये जुर्माने की सजा दी।
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(प्रतीकात्मक फोटो) - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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झारखंड की रांची सिविल कोर्ट स्थित भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (एसीबी) की विशेष अदालत ने जमीन के म्यूटेशन के बदले रिश्वत लेने के मामले में हल्का कर्मचारी भानु प्रताप प्रसाद को दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई है। अदालत ने आरोपी को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की संबंधित धाराओं के तहत एक-एक साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई और प्रत्येक धारा के तहत 10,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया। इस मामले में खास बात यह रही कि 20 साल से अधिक समय तक चली कानूनी लड़ाई के दौरान केस का सूचक और मुख्य गवाह अदालत में अपने बयान से मुकर गया था। इसके बावजूद एसीबी की ओर से पेश किए गए वैज्ञानिक साक्ष्यों, फॉरेंसिक रिपोर्ट और अन्य सबूतों के आधार पर अदालत ने आरोपी को दोषी करार दिया।

जमीन के म्यूटेशन के बदले मांगी थी रिश्वत

मामले के अनुसार, राजस्व हल्का कर्मचारी भानु प्रताप प्रसाद ने जमीन का म्यूटेशन करने के बदले रिश्वत मांगी थी। इसकी शिकायत मिलने के बाद एसीबी ने कार्रवाई की तैयारी की। ट्रैप से पहले की प्रक्रिया के तहत शिकायतकर्ता की ओर से दिए गए 100-100 रुपये के सात नोटों, यानी कुल 700 रुपये के सीरियल नंबर दर्ज किए गए। इसके बाद इन नोटों पर फिनोलफथलीन पाउडर लगाया गया।

इस कार्रवाई में एक वैज्ञानिक तरीके का इस्तेमाल किया गया। फिनोलफथलीन पाउडर लगे हाथ या कागज को सोडियम कार्बोनेट के घोल में डालने पर घोल गुलाबी हो जाता है। एसीबी ने इसी वैज्ञानिक प्रक्रिया के आधार पर रिश्वत लेते हुए आरोपी को पकड़ने की योजना बनाई।

रिश्वत के रुपये लेते ही एसीबी ने पकड़ा

एसीबी की ट्रैप टीम ने 8 अगस्त 2002 को भानु प्रताप प्रसाद के कार्यालय-सह-निवास पर छापा मारा। आरोप के अनुसार, रिश्वत की मांग किए जाने पर शिकायतकर्ता ने फिनोलफथलीन पाउडर लगे 100-100 रुपये के सात नोट आरोपी को दे दिए। जैसे ही भानु प्रताप प्रसाद ने रुपये अपने हाथ में लिए, मौके पर मौजूद एसीबी टीम ने उसके दोनों हाथ पकड़ लिए।

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इसके बाद आरोपी के दोनों हाथों को अलग-अलग सोडियम कार्बोनेट के घोल में धुलाया गया। घोल का रंग तुरंत गुलाबी हो गया। एसीबी ने इस प्रक्रिया से मिले घोल को अलग-अलग बोतलों में सुरक्षित रखकर सील किया और जांच के लिए विधि विज्ञान प्रयोगशाला (एफएसएल) भेज दिया। फॉरेंसिक जांच रिपोर्ट में भी घोल में फिनोलफथलीन और सोडियम कार्बोनेट की मौजूदगी की पुष्टि हुई।

700 रुपये के नोटों के सीरियल नंबर भी मिले सही

कार्रवाई के दौरान स्वतंत्र गवाहों की मौजूदगी में आरोपी के पास से 700 रुपये बरामद किए गए। बरामद नोटों के सीरियल नंबर का मिलान पहले से तैयार जीसी नोट मेमोरेंडम से किया गया। सभी नोटों के नंबर सही पाए गए। इससे एसीबी की ओर से पेश किए गए साक्ष्यों को मजबूती मिली।

मुख्य गवाह के मुकरने के बाद भी नहीं बच सका आरोपी

इस मामले की सुनवाई 20 साल से अधिक समय तक चली। इस दौरान केस का सूचक और प्रमुख गवाह अदालत में अपने पहले के बयान से मुकर गया। हालांकि, गवाह के मुकरने के बावजूद आरोपी को इसका लाभ नहीं मिला। एसीबी की ओर से पेश किए गए रासायनिक साक्ष्य, एफएसएल रिपोर्ट, बरामद नोट और उनके सीरियल नंबर से जुड़े दस्तावेजों को अदालत ने महत्वपूर्ण माना।

इन सबूतों के आधार पर विशेष अदालत ने भानु प्रताप प्रसाद को दोषी ठहराते हुए भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की संबंधित धाराओं के तहत एक-एक साल के कठोर कारावास और प्रत्येक धारा में 10,000 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई। यह फैसला दिखाता है कि किसी मामले में प्रमुख गवाह के मुकरने के बावजूद वैज्ञानिक और अन्य ठोस साक्ष्य अपराध साबित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

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